शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

*माया का अंग १०७*(१३/१६)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*जीव गहिला जीव बावला, जीव दीवाना होइ ।*
*दादू अमृत छाड़ कर, विष पीवै सब कोइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
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*माया का अंग १०७*
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माया तरुवर पत्र घट१, इक उपजै इक जांहिं । 
रज्जब पूरण दशों दिशि, रीती कबहुं नाँहिं ॥१३॥
जैसे वृक्ष में पत्ता एक उत्पन्न होता है और एक गिर जाता है, वैसे ही इस माया रूप संसार में एक शरीर१ जन्मता है और एक मरता है किन्तु दशों दिशाओं में यह संसार-रूप माया मनुष्यादि से परिपूर्ण है, खाली कभी भी नहीं होती । 
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ज्यों सूरज दीसे समुद्र में, मीन मरे नहिं कोय । 
त्यों रज्जब माया मगन, हरि गुण लिप्त१ न होय ॥१४॥
जैसे सूर्य का प्रतिबिंब समुद्र में मच्छियों को दिखता है किन्तु उसके ताप से मच्छी मरती, वैसे ही जो माया में निमग्न है वह हरि-गुण-गान में अनुरक्त१ नहीं होता । 
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पड़दा परवत पलक का, उभय एक करि जानि । 
जन रज्जब जोख्यों१ इहै, हरि देखन की हानि ॥१५॥
पर्वत तथा पलक दोनों ही पड़दे एक जैसे जानो, दोनों से दृष्टि रुकती है, वैसे ही माया थोड़ी वा अधिक दोनों ही ब्रह्म के साक्षात्कार करने में हानि१कारक है । 
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ना मरदों भुगती नहीं, मरद गये करि त्याग । 
रज्जब रिधि१ क्वारी२ रही, पुरुष पाणि३ नहिं लाग ॥१६॥ 
नामर्द तो भोग न सके और मर्द त्यागकर विरक्त हो गये, पुरुष का हाथ३ न लगने से माया१ कुमारी२ ही रही ।
(क्रमशः)

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