मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

*द्वितीय दर्शन का प्रसंग*

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*दादू चन्दन कद कह्या, अपना प्रेम प्रकाश ।* 
*दह दिशि प्रगट ह्वै रह्या, शीतल गंध सुवास ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ साधु का अंग)* 
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत {श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}* 
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ 
श्रीरामकृष्ण अकेले तखत पर बैठे हैं । कमरे में धूप की सुगन्ध भर रही है । सभी दरवाजे बन्द हैं । मास्टर ने अन्दर आते ही हाथ जोड़कर प्रणाम किया । श्रीरामकृष्ण द्वारा बैठने की आज्ञा पाकर वे और सिधू फर्श पर बैठ गए । श्रीरामकृष्ण ने पूछा, कहाँ रहते हो, क्या करते हो, वराहनगर क्यों आए इत्यादि । मास्टर ने कुल परिचय दिया । 
वे देखने लगे कि श्रीरामकृष्ण का मन बीच बीच में मानो दूसरी ओर खींच रहा है । उन्हें बाद में मालुम हुआ कि इसी को ‘भाव’ कहते हैं । मानो कोई बंसी डालकर मछली पकड़ने बैठा है जब मछली आकर काँटे में लगे चारे को खाने लगती है और बंसी का शोला हिलने लगता है, उस समय वह आदमी किस प्रकार व्यस्त होकर बंसी को पकड़े हुए एकाग्र चित्त से शोले की ओर टक लगाकर देखने लगता है, -किसी से बातचीत नहीं करता यह भी ठीक उसी प्रकार का भाव था ।
बाद में मास्टर ने सुना और देखा कि सन्ध्या के बाद श्रीरामकृष्ण को इस प्रकार का भावान्तर प्रायः प्रतिदिन हुआ करता है, कभी कभी तो वे पूरी तरह बाह्यज्ञान-शून्य हो जाते हैं ।
मास्टर- आप तो अब सन्ध्या करेंगे, हम अब चलें ।
श्रीरामकृष्ण(भावस्थ)- नहीं, -सन्ध्या-ऐसा कुछ नहीं । 
और कुछ देर बातचीत होने के बाद मास्टर ने प्रणाम किया और चलना चाहा । श्रीरामकृष्ण ने कहा, “फिर आना ।” 
मास्टर लौटते समय सोचने लगे- “ये सौम्यदर्शन पुरुष कौन हैं? इनके पास फिर लौट जाने की इच्छा हो रही है ! क्या बिना पुस्तकों के पढ़े भी मनुष्य महान् बन सकता है? कितना आश्चर्य है, मुझे यहाँ फिर आने की इच्छा हो रही है इन्होंने भी कहा, ‘फिर आना’ कल या परसों सबेरे फिर आऊँगा ।” 
*परिच्छेद २~द्वितीय दर्शन* 
*अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।* 
*तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥* 
द्वितीय दर्शन का प्रसंग । सुबह का समय था, आठ बजे होंगे । श्रीरामकृष्ण उस समय दाढ़ी बनवाने की तैयारी में थे । तब भी थोड़ी ठण्डी थी । इसलिये वे शरीर पर गरम किनारीदार शाल ओढ़े हुए थे । मास्टर को देखकर उन्होंने कहा, “तुम आए हो? अच्छा, यहाँ बैठो ।” 
यह वार्तालाप श्रीरामकृष्ण के कमरे के दक्षिण-पूर्व बरामदे में हो रहा था । नाई आया हुआ था । श्रीरामकृष्ण उसी बरामदे में बैठकर दाढ़ी बनवाने लगे । बीच बीच में वे मास्टर के साथ बातचीत कर रहे थे । शरीर पर शाल थी, पैर में जूतियाँ । सहास्यवदन थे । बात करते समय कुछ तुतलाते थे । 
श्रीरामकृष्ण(मास्टर से)- क्यों जी, तुम्हारा घर कहाँ है?
मास्टर- जी कलकत्ते में । 
श्रीरामकृष्ण- यहाँ कहाँ आए हो? 
मास्टर- यहाँ वराहनगर में बड़ी दीदी के घर आया हूँ, -ईशान कविराज के यहाँ । 
श्रीरामकृष्ण- ओहो, ईशान के यहाँ । 
श्री केशवचन्द्र सेन के लिए श्रीरामकृष्ण का जगन्माता के पास रोना । 
श्रीरामकृष्ण- क्यों जी, केशव अब कैसा है-बहुत बीमार था । 
मास्टर- जी हाँ, मैंने भी सुना था कि बीमार हैं, पर अब शायद अच्छे हैं । 
श्रीरामकृष्ण- मैंने तो केशव के लिए माँ के निकट नारियल और चीनी की पूजा मानी थी । रात को जब नींद उचट जाती थी, तब माँ के पास रोता और कहता था, - ‘माँ, केशव की बिमारी अच्छी कर दे । केशव अगर न रहा तो मैं कलकत्ते जाकर बातचीत किससे करूँगा?’ इसी से तो नारियल-चीनी मानी थी ।
“क्यों जी, क्या कोई कुक साहब आया है? सुना वह लेक्चर(व्याख्यान) देता है । मुझे केशव जहाज पर चढ़ाकर ले गया था । कुक साहब भी साथ था ।” 
मास्टर- जी हाँ, ऐसा ही कुछ मैंने भी सुना था । परन्तु मैंने उनका लेक्चर नहीं सुना । उनके विषय में ज्यादा कुछ मैं नहीं जानता ।
*गृहस्थ तथा पिता का कर्तव्य*
श्रीरामकृष्ण- प्रताप का भाई आया था । कुछ दिन यहाँ रहा । काम-काज कुछ है नहीं । कहता है, मैं यहाँ रहूँगा । सुनते हैं, जोरू जाता सब को ससुराल भेज दिया है । कच्चे-बच्चे कई हैं । मैंने खूब डाँटा भला देखो तो, लड़के-बच्चे हुए हैं, उनकी देख-रेख, उनका पालपोष तुम न करोगे तो क्या कोई गाँववाला करेगा? शर्म नहीं आती, बीवी-बच्चों को ससुर के यहाँ रख दिया है, उन्हें कोई और पाल रहा है । बहुत डाँटा और काम-काज खोज लेने को कहा, तब यहाँ से गया ।
(क्रमशः)

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