मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

*२३. विवाह*

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*दादू होना था सो ह्वै रह्या, जे कुछ किया पीव ।*
*पल बधै न छिन घटै, ऐसी जानी जीव ॥*
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*२३. विवाह*
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न गृहं गृहमित्याहुर्गृहिणी गृहमुच्यते।
तया हि सहितः सर्वान् पुरुषार्थान् समश्नुते॥[१]
( [१] ईंट, पत्थर और मिट्टी के बने हुए घर को घर नहीं कहते। असल में घर तो घरवाली(स्त्री) से ही है, जिसके साथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सभी पुरुषार्थ प्राप्त किये जा सकते हैं। सु. र. भां. 366/6)
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वट के नन्हें से बीज के अन्तर्गत एक महान वृक्ष छिपा रहता है, अज्ञानी लोग उसे भी अन्य पौधों के बीज की भाँति छोटा-सा ही बीज समझते हैं। अजवाइन के बीजों के साथ ही वट के बीज को भी बोते हैं, पहले-पहले दोनों का अंकुर एक-सा ही निकलता है, किन्तु आगे चलके अजवाइन का वृक्ष तो थोड़ा ही बढ़कर साल छः महीनों में ही सूख जाता है, किन्तु वट-वृक्ष निरन्तर बढ़ता ही रहता है और कालान्तर में जाकर वह एक महान विशाल वृक्ष बन जाता है, जिसकी छाया में बैठकर असंख्यों पसीनों से भींगे हुए प्राणी शीतलता का सुखास्वादन करते हैं, उसकी पूर्ण आयु का अनुमान भी नहीं किया जाता है। वह शाश्वत वृक्ष बन जाता है।
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निमाई यद्यपि अपने विद्यार्थियों की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान और विलक्षण थे, फिर भी साधारण लोग यही समझते थे कि कालान्तर में यह भी एक पाठशाला खोलकर नवद्वीप का अन्य पण्डितों की भाँति एक नामी पण्डित बन जायगा। यह भी अन्य पण्डितों की भाँति स्त्री-पुत्रों में आसक्त होकर सुखपूर्वक संसारी सुखों का उपभोग करेगा।
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क्योंकि विद्वान हो अथवा मूर्ख संसारी विषयों में तो सब समानरूप से ही रत रहते हैं। बड़े लोगों की भोग-सामग्री बहुमूल्य ओर बड़ी होती है। छोटे लोग साधारण भोग-सामग्रियों से ही अपनी वासनाओं को पूर्ण करते हैं, किन्तु उनमें आसक्ति दोनों की समान ही है। बँधे दोनों ही हैं। फिर चाहे वह बन्धन रस्सी का हो अथवा रेशम का। सोने की हो या लोहे की, बेड़ी तो समान ही हैं।
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दोनों ही बन्धन से प्रभु की इच्छा के बिना नहीं निकल सकते। अन्यान्य पण्डितों को धन के ही लिये विद्योपार्जन करते देख लोगों का यही अनुमान हो गया था कि निमाई भी अपने विद्या-बल से खूब धन प्राप्त करेगा। उन्हें यह पता नहीं था, इसके उपदेश से असंख्यों मनुष्य स्त्री, धन, परिवार और समस्त उत्तमोत्तम भोग-सामग्रियों को तुच्छ समझकर महाधन की प्राप्ति में कटिबद्ध हो जायँगे और अपने मनुष्य जन्म को सार्थक बनावेंगे।
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संसारी लोग बेचारे और अनुमान कर ही क्या सकते हैं? इनका आरम्भिक जीवन आदि में अन्य साधारण जीवनों की भाँति था ही, इससे लोगों का यही अनुमान लगाना ठीक था। निमाई की अवस्था अब सोलह वर्ष की है। व्याकरण, अलंकार और न्याय में इन्होंने प्रवीणता प्राप्त कर ली है। आगे पढ़ने की भी इच्छा थी, किन्तु कई कारणों से इन्होंने पाठशाला में जाकर पढ़ना बंद कर दिया। घर पर अकेली विधवा माता थी, निर्वाह का कोई दूसरा प्रबन्ध नहीं था।
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आकाशी वृत्ति थी, ईश्वरेच्छा से जो भी आ जाता उसी पर निर्वाह होता। मिश्र जी कोई सम्पत्ति नहीं छोड़ गये थे, उनके सामने भी इसी प्रकार निर्वाह होता था। अब निमाई समझदार हो गये, विद्वान भी बन गये, इसीलिये अब जीवन-निर्वाह के लिये भी कुछ उद्योग करना चाहिये। वृद्धा माता को सुख पहुँचाने का यही अवसर है।
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यह सब सोच-समझकर इन्होंने सोलह वर्ष की छोटी ही अवस्था में अध्यापन का कार्य करना आरम्भ कर दिया। इनकी विलक्षण बुद्धि और पठन-पाठन को अद्वितीय सुन्दर शैली से सभी शास्त्रीय ज्ञान रखने वाले पुरुष परिचित थे। इसलिये इन्हें नवद्वीप-जैसे विद्या के भारी केन्द्रस्थान में अध्यापक बनने में कोई कठिनता न हुई। नवद्वीप में मुकुन्द संजय नाम के एक विद्यानुरागी धनी-मानी व्यक्ति थे। उनके एक पुरुषोत्तम संजय नाम का पुत्र था।
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संजय महाशय अपने पुत्र के पढ़ाने के निमित्त किसी योग्य अध्यापक की तलाश में थे। निमाई की ऐसी इच्छा देख उन्होंने इनसे प्रार्थना की। निमाई स्वयं ही एक पाठशाला स्थापित करने की बात सोच रहे थे, किन्तु उनके छोटे-से मकान में पाठशाला स्थापित करने के योग्य स्थान ही न था। संजय भगवत-भक्त होने के साथ धनी भी थे।
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बंगाल में प्रायः सभी धार्मिक पुरुषों के यहाँ एक ‘चण्डी-मण्डप’ नाम से अलग स्थान होता है, उसे ‘देवी-गृह’ या ‘ठाकुर-दालान’ भी कहते हैं। नवदुर्गाओं में उक्त स्थान पर ही चण्डीपाठ और पूजा तथा उत्सव हुआ करते हैं। यह स्थान ऐसे ही शुभ कार्यों के लिये सुरक्षित होते हैं। योग्य और विद्वान अतिथि के आने पर इसी स्थान में उनका आतिथ्यादि भी किया जाता है। अपनी शक्ति के अनुसार धनिकों का चण्डी-मण्डप विस्तृत, सुन्दर और अधिक कीमती होता है।
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संजय महाशय का चण्डीमण्डप खूब बड़ा था। निमाई पण्डित ने उसी मण्डप में अपनी पाठशाला स्थापित की। इधर-उधर से बहुत-से छात्र इनका नाम सुनकर पढ़ने आने लगे। पुत्र के साथ संजय भी निमाई से विद्याध्ययन करने लगे। इनकी पढ़ाने की शैली बड़ी ही सरस तथा चित्ताकर्षक थी, इसलिये थोड़े ही समय में इनकी पाठशाला चल निकली और सैकड़ों छात्र इनके पास पढ़ने आने लगे।
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ये विद्यार्थियों के साथ गुरु-शिष्य का व्यवहार न करके एक प्रेमी मित्र का-सा व्यवहार करते। उनसे खूब हँसी-दिल्लगी करते, घर का हाल-चाल पूछते ओर अपनी सब बातें बताते। इससे विद्यार्थी इनके ऊपर अत्यधिक अनुराग रखने लगे। बहुत-से विद्यार्थी तो इनसे अवस्था में बहुत बड़े-बड़े थे। वे सब भी इनके पास अध्ययन करने आते और इनका हृदय से बहुत अधिक आदर करते थे। इस प्रकार इनकी पाठशाला नवद्वीप में एक प्रसिद्ध पाठशाला मानी जाने लगी।
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व्याकरण-शास्त्र में गंगादास जी की पाठशाला को छोड़कर निमाई की पाठशाला सबसे श्रेष्ठ समझी जाती थी। निमाई विद्यार्थियों के साथ परिश्रम भी खूब करते थे। एक दिन निमाई पण्डित पाठशाला से पढ़ाकर अपने घर जा रहे थे। दैवात गंगा जी जाते हुए रास्ते में पं. बल्लभाचार्ज जी की तनया लक्ष्मीदेवी से उनका साक्षात्कार हो गया।
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बल्लभाचार्य निमाई के सजातीय ब्राह्मण थे। इन्होंने लक्ष्मीदेवी को पहले भी कई बार देखा था, किन्तु आज के दर्शन में विशेषता थी। लक्ष्मीदेवी को देखते ही परम सदाचारी निमाई के ‘भावस्थितानि जननान्तरसौहृदानि’ इस न्याय के अनुसार पूर्वजन्म के संस्कार जाग्रत हो उठे। स्वाभाविक सौहृद तो स्वतः ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है, इसमें चेष्टा करना या अनुराग करना तो कहा ही नहीं जा सकता। इन्होंने लक्ष्मीदेवी की ओर देखा। लक्ष्मीदेवी ने भी धीरे से इनकी ओर देखा और इनके पादपद्मों में भक्ति से मन-ही-मन प्रणाम करके वह गंगा की ओर चली गयी। ये अपने घर की ओर चले गये।
(क्रमशः)

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