मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

*२३. विवाह*


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*दादू होना था सो ह्वै रह्या, और न होवै आइ ।*
*लेना था सो ले रह्या, और न लिया जाइ ॥*
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*२३. विवाह*
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भावी की भवितव्यता तो देखिये उसी दिन बनवारी घटक नाम के जगन्नाथ मिश्र के स्नेही एक ब्राह्मण शचीदेवी के समीप आये और माता से कहने लगे- ‘निमाई अब सयाना हो गया है, अब उसके विवाह का शीघ्र ही उद्योग करना चाहिये। यदि तुम्हें पसंद हो तो पं. बल्लभाचार्य की एक कन्या है। तुम उसे चाहो तो देख सकती हो। लाखों में एक है, बड़ी ही सुशीला, सुन्दरी और बुद्धिमती लड़की है। निमाई के वह सर्वथा योग्य है। यदि तुम्हें यह सम्बन्ध मंजूर हो तो मैं पण्डित जी से इस सम्बन्ध में कहूँ।’
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माता स्वयं पुत्र के विवाह की चिन्ता में थीं, किन्तु वे निमाई की इच्छा के बिना कोई सम्बन्ध निश्चित करना नहीं चाहती थीं। घर में कोई दूसरा आदमी सलाह करने के लिये था नहीं, पुत्र समझदार और सयाना था, उसकी अनुमति के बिना वे विवाह के सम्बन्ध में किसी को निश्चित वचन नहीं दे सकती थीं, अतः बात को टालते हुए माता ने कहा- ‘इस पितृ-हीन बालक का विवाह ही क्या है, अभी तो वह पढ़ ही रहा है। कुछ करने लगेगा तो देखा जायगा।’
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घटक महाशय शचीमाता का ऐसा उदासीन भाव देखकर समझ गये कि माता को यह सम्बन्ध मंजूर नहीं। कारण कि पं. बल्लभाचार्य बहुत ही गरीब थे। ब्राह्मण ने समझा, माता अपने पण्डित पुत्र का निर्धन की लड़की के साथ विवाह करना नहीं चाहती। यह समझकर वे लौट आये। दैवात रास्ते में उन्हें निमाई मिल गये। इन्हें देखते ही निमाई खिल उठे ओर हँसते हुए बोले- ‘कहिये, घटक महाशय ! किधर-किधर से आगमन हो रहा है।’
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कुछ असन्तोष के भाव से घटक ने उत्तर दिया- ‘तुम्हारी माता के पास पं. बल्लभाचार्य की पुत्री के साथ तुम्हारे विवाह की बातचीत करने गया था, सो उन्होंने मंजूर ही नहीं किया। कहो तुम्हारी क्या सलाह है?’
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निमाई यह सुनकर हँस पड़े। उन्होंने कुछ भी उत्तर नहीं दिया, वे हँसते हुए घर चले गये। घर पहुँचकर इन्होंने कुछ मुस्कराते हुए कहा- ‘घटक उदास होकर जा रहे थे, बल्लभाचार्य जी का सम्बन्ध मंजूर क्यों नहीं किया?’ माता समझ गयी कि निमाई को इस सम्बन्ध में कोई आपत्ति नहीं है, इसलिये उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई।
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दूसरे दिन घटक को बुलाकर उन्होंने कहा- ‘आचार्य महाशय, कल आप जो बात कहते थे, वह मुझे स्वीकार है, आप पं. बल्लभाचार्य से कहकर सब ठीक करा दीजिये। आप ही अब हमारे हितैषी हैं और घर में दूसरा है ही कौन? आपका ही लड़का है जैसे चाहें कीजिये।’
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बनवारी घटक को यह सुनकर बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उसी समय बल्लभाचार्य के घर पहुँचे। आचार्य ने इनका सत्कार किया और आने का कारण जानना चाहा। इन्होंने सब वृत्तान्त बता दिया। इस संवाद को सुनकर पं. बल्लभाचार्य को तथा उनके समस्त घरवालों को बड़ी प्रसन्नता हुई।
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वे घटक से कहने लगे- ‘मेरा सौभाग्य है कि शची देवी ने इस सम्बन्ध को स्वीकार कर लिया है। निमाई पण्डित-जेसे विद्वान को अपना जामाता बनाने में मैं अपना अहोभाग्य समझता हूँ। लड़की के पूर्वजन्म के शुभ संस्कारों के उदय होने पर ही ऐसा वर मिल सकता है, किन्तु आप मेरी परिस्थिति से तो परिचित ही हैं। मेरे पास देने-लेने के लिये कुछ नहीं है। केवल पाँच हरीति की के साथ कन्या को ही समर्पित कर सकूँगा। यदि यह बात उन्हें मंजूर हो तो आप जब भी कहें मैं विवाह करने को तैयार हूँ।’
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घटक ने कहा- ‘आप इस बात की कुछ चिन्ता न कीजिये। शची देवी को रूपये-पैसे का लोभ नहीं है। वे तो सुशीला सुन्दरी लड़की ही चाहती हैं, आप प्रसन्नता के साथ विवाह की तैयारियाँ कीजिये।’ यह कहकर घटक महाशय बल्लभाचार्य जी से विदा होकर शची देवी के पास आये और सम्पूर्ण वृत्तान्त सुना दिया।
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दोनों ओर से विवाह की तैयारियाँ होने लगीं। नियत तिथि के दिन अपने स्नेही बन्धु-बान्धव तथा विद्यार्थियों के साथ बरात लेकर निमाई बल्लभाचार्य जी के घर गये। आचार्य ने सभी का यथोचित सम्मान किया। गोधूलि की शुभ लग्न में निमाई पण्डित ने लक्ष्मी देवी का पाणिग्रहण किया।

लक्ष्मी देवी ने काँपते हुए हाथों से इनके चरणों में माला अर्पण की और भक्तिभाव के साथ प्रणाम किया। इन्होंने उन्हें वामांग किया। हवन, प्रदक्षिणा, कन्यादान आदि सभी वैदिक कृत्य होने पर विवाह का कार्य सकुशल समाप्त हुआ। दूसरे दिन आचार्य से विदा होकर लक्ष्मी देवी के साथ पालकी में चढ़कर निमाई घर आये। माता ने सती स्त्रियों के साथ पुत्र और पुत्रवधू का स्वागत किया।
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ब्राह्मणों को तथा अन्य आश्रित जनों को यथायोग्य द्रव्य-दान किया गया। लक्ष्मी देवी का रंग-रूप निमाई के अनुरूप ही था। इस जुगल जोड़ी को देखकर पास-पड़ोस की स्त्रियाँ परम प्रसन्न हुईं। कोई तो इन्हें रति-कामदेव की उपमा देने लगी, कोई-कोई शची-पुरन्दर कहकर परिहास करने लगी, कोई-कोई गौर-लक्ष्मी कहकर निमाई की ओर हँसने लगी। सुन्दरी पुत्रवधू के साथ पुत्र को देखकर माता को जो आनन्द प्राप्त हुआ उसका वर्णन करना इस लोह की लेखनी के बाहर की बात है।
(क्रमशः)

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