मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

*२२. विद्याव्यासंगी निमाई*

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*साहिब जी की आत्मा, दीजे सुख संतोंष ।*
*दादू दूजा को नहीं, चौदह तीनों लोक ॥*
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*२२. विद्याव्यासंगी निमाई*
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निमाई के मुख से उस इतनी कठिन पंक्ति को खिलवाड़ की भाँति हँसते-हँसते लगाते देख रघुनाथ के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उन्हें जो शंका थी, वह प्रत्यक्ष आ उपस्थित हुई। उनकी सभी आशा पर पानी फिर गया। भोजन बनाना भूल गये।
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निमाई उनके मनोभाव को ताड़ गये कि रघुनाथ कुछ लज्जित हो गये हैं, इसलिये यह कहते हुए कि ‘अच्छा आप भोजन बनावें फिर मिलेंगे।’ पाठशाला की ओर चले गये। रघुनाथ ने जैसे-तैसे भात तो बनाया, किन्तु उनके हृदय में निमाई की बुद्धि के प्रति डाह होने के कारण उन्हें भोजन में आनन्द नहीं आया, जैसे-तैसे भोजन करके वे पाठशाला में आये।
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अब निमाई की अवस्था सोलह वर्ष की हो चुकी थी, उनके घुँघराले लम्बे-लम्बे बाल, तेजस्वी चेहरा, सुगठित शरीर, बड़ी-बड़ी सुहावनी आँखें, मिष्ट-भाषण और मन्द-मन्द मुस्कान देखने वाले को स्वतः ही अपनी ओर आकर्षित कर लेती थी।
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वे सभी से दिल खोलकर मिलते और खूब घुल-घुलकर बातें करते। उनके मिलने वाले परस्पर में सभी यही समझते कि निमाई जितना अधिक स्नेह हमसे करता है, उतना किसी दूसरे से शायद ही करता हो। इसका कारण यह था कि उनके हृदय में किसी भी प्राणी के प्रति द्वेष नहीं था। जिसके हृदय में प्राणिमात्र के प्रति सम्मान है, उसे सभी अपना सगा-सम्बन्धी समझने लगते हैं। इसीलिये निमाई के बहुत अधिक स्नेही थे।
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व्याकरण पढ़ने के अनन्तर ये न्याय का अभ्यास करने लगे और उसी बीच न्याय के ऊपर भी एक टिप्पणी लिखने लगे। इनके सहपाठी और स्नेही पं. रघुनाथ जी उसी समय अपने जगत प्रसिद्ध ‘दीधिति’ ग्रन्थ को लिख रहे थे। वे समझते थे, मेरा यह ग्रन्थ अर्वाचीन-न्याय के ग्रन्थों में अद्वितीय होगा।
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जब उन्होंने सुना कि निमाई भी एक न्याय का ग्रन्थ लिख रहे हैं, तब तो इनको भय मालूम पड़ने लगा और इनकी प्रबल इच्छा हुई कि उस ग्रन्थ को देखना चाहिये। यह सोचकर एक दिन उन्होंने निमाई से कहा- ‘भाई ! हमने सुना है, न्याय के ऊपर तुम कोई ग्रन्थ लिख रहे हो? हमारी बड़ी इच्छा है, किसी दिन अपने ग्रन्थ को हमें भी दिखाओ’।

इन्होंने जोरों से हँसते हुए कहा- ‘अजी ! आप भी कैसी बात कर रहे हैं। भला, हम न्याय-जैसे जटिल विषय पर लिख ही क्या सकते हैं? यह तो आप-जैसे पण्डितों का काम है। हम तो वैसे ही मनोविनोद के लिये खिलवाड़-सा करने लगे हैं। आपसे किसने कह दी?’
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रघुनाथ ने आग्रह के साथ कहा- ‘कुछ भी हो, मेरी बड़ी प्रबल इच्छा है, यदि तुम्हें कोई आपत्ति न हो तो अपने ग्रन्थ को मुझे जरूर दिखाओ।’ इन्होंने जल्दी से कहा- ‘भला, इसमें आपत्ति की बात ही क्या हो सकती है? यह तो हमारा सौभाग्य है कि आप-जैसे विद्वान हमारी कृति को देखने की जिज्ञासा करते हैं। मैं कल जरूर उसे लेता आऊँगा।’ दूसरे दिन निमाई अपने ग्रन्थ को साथ लेते आये।
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पाठशाला से लौटते समय वे नाव पर बैठकर रघुनाथ को अपने ग्रन्थ को सुनाने लगे। रघुनाथ ज्यों-ज्यों उस ग्रन्थ को सुनते थे, त्यों-ही-त्यों उनकी मनोवेदना बढ़ती जाती थी। यहाँ तक कि वे ग्रन्थ को सुनते-सुनते फूट-फूटकर रोने लगे। निमाई अपनी धुनि में सुनाते ही जा रहे थे, उन्हें पता भी नहीं था कि रघुनाथ की ग्रन्थ के सुनने से क्या दशा हो रही है। सुनाते-सुनतो एक बार इन्होंने दृष्टि उठाकर रघुनाथ की ओर देखा। इनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा।
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आश्चर्य प्रकट करते हुए निमाई ने पूछा- ‘भैया ! तुम रो क्यों रहे हो?’ आँसू पोंछते हुए रुद्धकण्ठ से उन्होंने कहा- ‘निमाई ! तुमसे मैं अपने मनोगत भावों को छिपाकर एक नया दूसरा पाप न करूँगा। सत्य बात तो यह है कि मैं इस अभिलाषा से एक ग्रन्थ लिख रहा था कि वह सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ होगा। किन्तु तुम्हारे इस ग्रन्थ को देखकर मेरी चिराभिलषित आशा पर पानी फिर गया। भला, तुम्हारे इस ग्रन्थ के सामने मेरे ग्रन्थ को कौन पूछेगा?’ इसी मनोवेदना के कारण मैं अपने आँसुओं को रोकने में असमर्थ हो गया हूँ।’
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यह सुनकर निमाई बड़े जोरों से हँसे और उन्हें स्पर्श करते हुए बोले- ‘बस, इस छोटी-सी बात के ही लिये आप इतना अनुताप कर रहे हैं। भला, यह भी कोई बात है, यह तो साधारण-सी पोथी है, मैं आपकी प्रसन्नता के निमित्त जलती अग्नि में भी कूदकर इन प्राणों को स्वाहा कर सकता हूँ, फिर यह तो बात ही क्या है?
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इस पुस्तक ने आपको इतना कष्ट पहुँचाया, तो इसे मैं अभी नष्ट किये देता हूँ।’ इतना कहते-कहते निमाई ने अपनी बड़े परिश्रम से हस्तलिखित पोथी को गंगा जी के प्रवाह में फेंक दिया। जाह्नवी के तीक्ष्ण प्रवाह की हिलोरों में पुस्तक के पन्ने इधर-उधर नाचने लगे, मानो निमाई के त्याग और प्रेम के गीत गा-गाकर वे आनन्द में थिरक रहे हों।
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रघुनाथ ने निमाई को गले से लगाया और प्रेम के कारण रूँधे हुए कण्ठ से बोले- ‘भैया निमाई ! ऐसा लोकोत्तर दुस्साध्य कार्य तुम्हीं कर सकते हो। इतनी भारी लोकैषणा को तृणवत समझकर उसका तिरस्कार कर देना तुम्हारे-जैसे ही महापुरुषों का काम है। हम तो कीर्ति और प्रतिष्ठा के कीड़े हैं। हमारी पुस्तक की अपेक्षा तुम्हारे इस त्याग की संसार में लाखों गुनी ख्याति होगी और आगे के लोग इस त्याग के द्वारा प्रेम का महत्त्व समझ सकेंगे।’
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इस प्रकार की बातें करते हुए दोनों मित्र अपने-अपने घर लौट आये। उसी दिन से निमाई का न्याय पढ़ना ही नहीं छूटा, किन्तु उनका पाठशाला जाना ही छूट गया। अब उन्होंने ऐसी विद्या को पढ़ना एकदम त्याग दिया। घर पर पिता की और ज्येष्ठ भ्राता की बहुत-सी पुस्तकें थीं, वे उन्हीं का स्वयं अध्ययन करने लगे।
(क्रमशः)

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