मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १३३/१३६*

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १३३/१३६*
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राहति कहति रस रांम बिन, ए पणि एक अग्यांन ।
कहि जगजीवन भगति करौ हरि, सो कहिये गुरु ग्यांन ॥१३३॥
संत जगजीवन जी महाराज कहते हैं कि हे प्राणी राम नाम के आनंद बिना कहीं रहना या कुछ कहना अज्ञान है, संत कहते हैं कि गुरु ने हरि की भक्ति करने का ही ज्ञान दिया है ।
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जगजीवन सतगुरु मिले, संसै राले भांन ।
सबद पिछाणैं साध का, हरि भजि राखै मांन ॥१३४॥
संत कहते हैं कि सद्गुरु मिलने से सारे भ्रम खत्म होते हैं । साधु जन का उपदेश मानने वाले का प्रभु भी मान रखते हैं ।
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चित चेला चंचल पुरी, क्यों अटकावै अंध ।
जगजीवन हरि भगति बिन, आन सकल ए धंध४ ॥१३५॥
संत कहते हैं कि मन चंचलता रुपी नगरी में अटकता है तो हे मनुष्य तुम क्यों अंधे होकर उसके अनुकूल हो जाते हो ? हे जीव ईश्वर की भक्ति के बिना सारा संसार ही विषयासक्त है, व्यर्थ है ।
(४. धंध-भ्रमात्मक कर्म)
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होइ मुरीद५ हरि नांम ले, पीर परम गुरु अक्षि६ ।
जगजीवन सब लखावैं, सोई लीजै लक्षि७ ॥१३६॥
संत कहते हैं कि हे जीव तुम पूर्ण आसक्ति से प्रभु का स्मरण करो । अन्य सब उद्देश्यहीन हैं वे लक्ष्य तक नहीं पहुंचा सकते । जिसके द्वारा सब ज्ञान हो वही लक्ष्य तक पहुंचा सकता है, वही ग्रहणीय है ।
(५. मुरीद-शिष्य, अनुगामी) (६. अक्षि-आँखों के सामने) (७. लक्षि-लक्ष्य{उद्देश्य})
(क्रमशः)

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