मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १२९/१३२*

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १२९/१३२*
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करहु क्रिपा हरि भगति द्यौ, सतगुरु थांभौ सास ।
लीन रहै मन आतमां, सु कहि जगजीवनदास ॥१२९॥
संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि हे प्रभु कृपा करें व अपनी भक्ति इस प्रकार से देवें की हर सांस में स्मरण हो और मन आत्मा आपमें ही लीन रहे ।
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सतगुरु सन्मुख सबद हरि, सरस साखि पद प्रेम ।
कहि जगजीवन पंच निवारी१, रांम भगति व्रत नेम ॥१३०॥
संत कहते हैं कि हे ईश्वर पांचों इन्द्रियाँ विकार रहित हों आपके चरणों में प्रेम बना रहे, मुहं से महिमा युक्त साखी उच्चरित हो, राम भक्ति का नियम बना रहे ... यह कृपा करें ।
(१. पंच निवारी-पांचों इन्द्रियों पर नियंत्रण करना)
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गुरु के आसिरवाद थैं, द्रवौ दया करि रांम ।
कहि जगजीवन भगति करि, सरि आवैं२ सब काम ॥१३१॥
संत कहते हैं कि गुरु महाराज के आशीर्वाद से, हे ईश्वर आप जीव पर द्रवित होकार दया करते हैं । संत कहते हैं कि ईश्वर की भक्ति से सभी कार्य सहज ही पूर्ण होते हैं ।
(२. सरि आवैं-पूर्ण हों)
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रांम भगति कर उधरौ, यहु गुरु दीन्हीं सीख ।
कहि जगजीवन अनभै उपजत, मन मांहै चलि बीख३ ॥१३२॥
संत कहते हैं कि राम की भक्ति करने से उद्धार होता है, यह शिक्षा हमें गुरु महाराज से मिली है । और यह वचन दादू दयाल जी महाराज की अनुभव वाणी से प्रकट है इस विषय में चिंतन मनन करना चाहिए ।
(३. बीख-चिंतन मनन करना)
(क्रमशः)

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