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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १३७/१४०*
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गुरु की सेवा वे करैं, जिन कै मांहै ग्यांन ।
जगजीवन कदरज८ फिरै, ते काला९ किंहि कांम ॥१३७॥
संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि वे जन ही गुरु महाराज की सेवा करते हैं जिनके मन में धर्म का ज्ञान है । तुच्छ जीव इस प्रकार सेवा नहीं करते वे यूं ही संसार में डोलते रहते हैं । वे पापीजन अपना जीवन व्यर्थ करते हैं ।
(८. कदरज-कदर्य = कृपण, तुच्छ) (९. काला-पापी, कुत्सित कर्म वाला)
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नेत्र तिनहुँ के ऊघड़े१०, जिन गुरु देख्या रांम ।
कहि जगजीवन अंध सो, जे निकट न सूझै रांम ॥१३८॥
संत कहते है वे जन ही जागृत हैं जिन्हें गुरु में ही ईश्वर दिखता है । और जो गुरु में ईश्वर नहीं देख पाते, गुरु को छोड़ अन्यत्र ईश्वर खोजते हैं वे नेत्र हीन ही हैं ।
(१०. ऊघड़े-खुल गये)
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अबिगत का गुण ऊपजै, तनिकै१ सकल विलांहि ।
कहि जगजीवन परम गुरु, जे हरि परसै नांहि ॥१३९॥
संत कहते हैं कि जब प्रभु कृपा होती है तो क्षण भर में सब विकार समाप्त होते हैं । और ये सब गुरु कृपा से ही होता है । वे ईश्वर से भी उंचे हैं जो हमें राह दिखाते हैं ।
(१. तनिकै-कुछ क्षण में ही सब भ्रमात्मक संसार नष्ट हो जाता है)
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सतगुरु सबद सुनत सोहि, रांम नांम सुख होइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, अम्रित पायो मोहि ॥१४०॥
संत कहते हैं कि वे जन ही गुरु आज्ञा में रहते हैं जिन्हें राम नाम में सुख होता है । गुरुदेव के शब्द ऐसे लगते हैं मानो उन्होंने अमृत रस का पान करा दिया हो वे मृत्यु भय से दूर करते हैं ।
(क्रमशः)

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