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*दादू आनंद सदा अडोल सौं, राम सनेही साध ।*
*प्रेमी प्रीतम को मिले, यहु सुख अगम अगाध ॥*
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साभार ~ Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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१६. अद्वैताचार्य और उनकी पाठशाला
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इन श्रीमाधवेन्द्रपुरी ने ही पहले-पहल संन्यासियों में भक्तिभाव तथा मधुर उपासना का प्रसार किया। इनके प्रसिद्ध शिष्यों में श्रीईश्वरपुरी, श्रीपरमानन्दपुरी, श्रीब्रह्मानन्दपुरी, श्रीरंगपुरी, श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि तथा श्रीरघुपति उपाध्याय विशेष उल्लेखनीय हैं।
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श्रीईश्वरपुरी इनके अन्तरंग तथा प्रधान शिष्य थे। इन्हें ही श्रीगौरांग के दीक्षागुरु होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। श्रीमाधवेन्द्रपुरी अद्वैताचार्य को देखकर बड़े ही प्रसन्न हुए। उनकी शीलता, नम्रता, विद्या, भक्ति और देश के उद्धार की सच्ची लगन को देखकर पुरी महाशय गद्गद हो उठे।
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उन्होंने अद्वैत को छाती से लगाया और श्रीकृष्ण-मन्त्र की दीक्षा देकर इनमें नवशक्ति का संचार किया। अपने गुरुदेव के सामने भी इन्होंने अपनी मनोव्यथा कही। तब पुरी महाशय ने इन्हें आश्वासन देते हुए कहा- ‘संसार की रचना उन्होंने ही की है। इस बढ़ते हुए कदाचार को वे ही भक्तभयहारी भगवान मेट सकेंगे, तुम घबड़ाओ मत। भगवान शीघ्र ही अपने किसी विशेष रूप से अवतीर्ण होकर भक्ति का उद्धार करेंगे।’
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गुरुदेव के आश्वासन से इन्हें विश्वास हो गया कि भगवान भक्तों के भय को भंजन करने के निमित्त अवश्य ही इस धराधाम पर अवतीर्ण होंगे। इसलिये ये अपने गुरुदेव की चरणरज मस्तक पर चढ़ार व्रज की यात्रा करते हुए शान्तिपुर लौट आये।
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श्रीअद्वैत की कुशाग्र बुद्धि और भगवत-भक्ति का श्रीमाधवेन्द्रपुरी पर प्रभाव पड़ा। जब उन्होंने गौड़देश की यत्रा की तो वे शान्तिपुर भी पधारे और कुछ काल अद्वैताचार्य के ही घर में रहे। अद्वैताचार्य नामी पण्डित होने के साथ ही धनवान भी थे। शान्तिपुर के वैष्णवों के वे ही एकमात्र आधार थे। उन दिनों शास्त्रार्थ करना ही पाण्डित्य का प्रधान गुण समझा जाता था।
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वाद-विवाद में विपक्षी को पराजित करके अपने पाण्डित्य का प्रदर्शन करना ही उन दिनों भारी पण्डित होने का प्रमाण पत्र था। इसलिये बहुत से पण्डित अपने को दिग्विजयी बताते थे और जिसके भी पाण्डित्य की प्रशंसा सुनते उसी से शास्त्रार्थ करने को उद्यत हो जाते थे।
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आचार्य की ख्याति सुनकर भी एक दिग्विजयी तर्कपंचानन महाशय इनसे शास्त्रार्थ करने आये और अन्त में इनसे परास्त होकर वे इनके शिष्य बन गये। इसलिये इनकी ख्याति अब पहले से और भी अधिक हो गयी।
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इनके पिता के आश्रयदाता महाराज दिव्यसिंह जी भी इनकी प्रशंसा सुनकर इनके दर्शनों के लिये आये। उन्होंने इनका भक्तिभावपूर्ण पाण्डित्य देखकर अपने सफेद बालों वाला सिर इनके चरणों पर रख दिया और गद्गद कण्ठ से कहा- ‘आपने अपने सम्पूर्ण कुल का उद्धार कर दिया। कृपा करके मुझे भी अपने चरणों की शरण दीजिये।’
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बूढे़ राजा शाक्त होने पर भी इनके शिष्य बन गये। वे इनमें बड़ी श्रद्धा रखते थे। अन्त में उन्होंने राज-काज छोड़कर एकान्त में अपना निवास स्थान बना लिया और कृष्ण-कीर्तन करते-करते ही शेष आयु का अन्त किया। अद्वैत की बाल-लीलाओं का वे सदा गुणगान करते रहते थे। उन्होंने संस्कृत में अद्वैत की बाल लीलाओं को लिखा भी था।
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श्रीमाधवेन्द्रपुरी ने इन्हें गृहस्थी बनने की आज्ञा दी। गुरुदेव की आज्ञा शिरोधार्य करके इन्होंने नारायणपुर निवासी पण्डित नृसिंह भादुड़ी की सीता और ठकुरानी नाम की दो पुत्रियों के साथ विवाह किया और उनके साथ सुखपूर्वक समय बिताने लगे। ये बड़े ही उदार, कोमलहृदय तथा कृष्ण-कथा-प्रिय थे।
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भेदभाव या संकीर्णता को ये कृष्ण-भक्ति में बाधक समझते थे। उन्हीं दिनों परम भक्त हरिदास भी इनके पास आये। ये यवन-बालक थे, किन्तु थे बड़े होनहार तथा कृष्ण-भक्त, इसलिये आचार्य ने इन्हें अपने पास ही रखकर व्याकरण, गीता, भागवत आदि को पढ़ाया। ये बड़े ही समझदार थे, आचार्य के चरणों में इनकी परम श्रद्धा थी, आचार्य भी इन्हें पुत्र की तरह मानते तथा प्यार करते थे।
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हरिदास आचार्य के घर में ही भोजन आदि करते थे। एक नामी पण्डित होकर अद्वैताचार्य मुसलमान-बालक को अपने घर में रखते हैं, इस बात से सभी पण्डित तथा ब्राह्मण इनका विरोध करने लगे, किन्तु इन्होंने उनकी कुछ भी परवा न की।
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एक दिन किसी ब्राह्मण के यहाँ श्राद्ध के समय सबसे प्रथम आचार्य ने श्राद्धान्न हरिदास के ही हाथों में दे दिया। इससे कुपित होकर पण्डितों ने इनसे कुछ बुरा-भला कहा। इन्होंने निर्भय होकर कह दिया- ‘हरिदास को भोजन कराने से मैं करोड़ों ब्राह्मणों के भोजनों का माहात्म्य समझता हूँ।’ इनकी इस बात से सभी भौचक्के-से रह गये। ये कोरे पण्डित ही न थे, किन्तु क्रियावान भक्त और विचारवान भी थे।
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ये शास्त्रों का पठन-पाठन करते हुए भी सदा हरि-कीर्तन और भगवत-भक्ति में परायण रहते थे। उन दिनों अधिकांश पण्डित पुस्तकों के कीडे़ तथा शुष्क वाद-विवाद करने वाले ही थे। शास्त्रों के अनुसार क्रियाएँ करना तो वे जानते ही न थे।
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शास्त्रों में ऐसे पण्डितों को मूर्ख कहा है-
शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा
यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान्।
सुचिन्तितं चैषधमातुराणां
न नाममात्रेण करोत्यरोगम्।।
अर्थात ‘शास्त्र पढ़ने पर भी यदि उसके अनुसार आचरण न करे तो मनुष्य मूर्ख ही बना रहता है। जैसे-कैसे भी बढ़िया-से-बढ़िया औषध को मन से सोच लो, जब तक उसे घोट-पीसकर व्यवहार में न लाओगे तब तक नीरोग कभी भी नहीं बन सकते।’
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उन दिनों के पण्डित ऐसे ही अधिक थे। अद्वैताचार्य की उनसे नहीं पटती थी, इसलिये इन्होंने अपनी एक नयी पाठशाला खोल ली। उसमें ये दिनभर तो शास्त्रों को पढ़ाते थे और रात्रि में हरिदास आदि अपने अन्तरंग भक्तों के साथ कृष्ण-कीर्तन करते थे।
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इनकी पाठशाला में विशेषकर भक्ति-शास्त्रों की ही चर्चा होती। इसलिये आस्तिक और भगवत-भक्त पण्डितगण इनके प्रति बड़ी ही श्रद्धा रखते थे। कहते हैं एक बार पण्डित जगन्नाथ मिश्र के घर जाकर इन्होंने उन्हें पुत्रवान होने का आशीर्वाद दिया था, तभी विश्वरूप का जन्म हुआ।
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निमाई जब गर्भ में थे तब शचीदेवी ने एक बार इनके चरणों में भक्तिभाव से प्रणाम किया। इन्होंने आशीर्वाद दिया- ‘इस गर्भ से तुम्हारे अवतारी पुत्र उत्पन्न होगा।’ इस प्रकार सभी धार्मिक लोग इनका बहुत अधिक सम्मान करते थे। पण्डित जगन्नाथ मिश्र से इनका बहुत अधिक स्नेह था। विश्वरूप को मिश्र जी ने इन्हीं के हाथों सौंप दिया था।
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विश्वरूप- जैसे मेधावी, गम्भीर और होनहार बालक को पाकर ये परम प्रसन्न हुए और बड़े ही मनोयोग के साथ उनको पढ़ाने लगे। विश्वरूप एक बार जिस श्लोक को पढ़ लेते दुबारा फिर उन्हें पूछने की आवश्यकता नहीं होती थी। उनकी बुद्धि असाधारण थी।
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प्रायः आचार्य की पाठशाला में ऐसे ही विद्यार्थी पढ़ते थे। दिनभर घट-पट और अवच्छिन्न-अवच्छेदकता ही बकते रहने वाले तथा सदा व्याकरण की फक्किकाओं के ही ऊपर सम्पूर्ण शक्ति खर्च कर देने वाले विद्यार्थी इनके यहाँ बहुत कम थे। उनके लिये तो और ही बहुत-सी पाठशालाएँ थीं। भक्तितत्त्व और सद्ज्ञान-वर्धन के निमित्त ही आचार्य ने अपनी पाठशाला खोल रखी थी। उन्हें पाठशाला से कुछ आजीविका तो करनी ही नहीं थी।
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उनकी पाठशाला में सदा भक्तितत्त्व के ही ऊपर आलोचना-प्रत्यालोचना होती रहती। विश्वरूप इन विषयों में सबसे अधिक भाग लेते। उनका चित्त बालकपन से ही संसार से विरक्त था। अद्वैताचार्य की कथाओं का तो आगे समय-समय पर यथास्थान उल्लेख होता ही रहेगा। अब आइये थोड़ा निमाई के दद्दा विश्वरूप के मनोविचारों को समझने की येष्टा करें। देखें वे अपने जीवन का क्या लक्ष्य स्थिर करते हैं।
(क्रमशः)

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