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*निकट निरंजन लाग रहु, जब लग अलख अभेव ।*
*दादू पीवै राम रस, निहकामी निज सेव ॥*
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साभार ~ Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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१७. विश्वरूप का वैराग्य
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को देशः कानि मित्राणि कः कालः कौ व्ययागमौ।
कश्चाहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः॥[१]
([१] देश क्या है? ये मित्र कौन है? समय क्या है? व्यय-आगम ये क्या चीज है? मैं स्वयं कौन हूँ और मेरी शक्ति क्या है? इन बातों का बार-बार चिन्तन करना चाहिये। अर्थात जो इस मनुष्य जन्म की महत्ता और काल की महानता समझते हैं, उनके हृदय में ये प्रश्न बार-बार उठते रहते हैं। सु. र. भां. ३८३/१)
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भगवत्पादपद्मों से पृथक होकर प्राणी प्रारब्धकर्मानुसार असंख्य योनियों में भ्रमण करता हुआ मनुष्ययोनि में अवतीर्ण होता है। एक यही योनि ऐसी है जिसमें वह अपने सत्स्वरूप को पुनः प्राप्त कर सकता है। मनुष्ययोनि ही कर्मयोनि है, शेष सभी भोगयोनियाँ हैं। मनुष्य ही कर्म के द्वारा निष्कर्म और पुनरावृत्ति से रहित बन सकता है।
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पुनरावृत्ति कर्मवासनाओं के द्वारा होती है। जीव अपनी वासनाओं के द्वारा फिर-फिर जन्म ग्रहण करता है और मरणके दुःखों को भोगता है। यदि कर्मवासना क्षय हो जाय तो परावर भगवान का दर्शन हो जाता है।
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भगवद्दर्शन के तीन मुख्य धर्म हैं-
(१) हृदय में जो अज्ञान की ग्रन्थि पड़ी हुई है, जिसके द्वारा असत पदार्थों को सत समझे बैठे हैं वह ग्रन्थि खुल जाती है।
(२) अज्ञान संशय के द्वारा उत्पन्न होता है और संशय ही विनाश का मुख्य हेतु है, परावर के साक्षात हो जाने पर सर्वसंशय आप-से-आप मिट जाते हैं। (३) संसृति का मुख्य हेतु है कर्मबन्ध। कर्म ही प्राणियों को नाना योनियों में सुख-दुःख भुगताते रहते हैं। जिसे भगवत-साक्षात्कार हो गया है उसके सभी कर्म क्षय हो जाते हैं। बस, फिर क्या है ! वह संसार-चक्र से मुक्त होकर अपने सत्स्वरूप को प्राप्त कर लेता है-
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥
यही तो जीव का परम पुरुषार्थ है। त्याग-धर्म सृष्टि के आदि में सबसे प्रथम उत्पन्न हुआ। सभी प्राणियों का मुख्य और प्रधान उद्देश्य है ‘त्याग’। इन संसारी विषयों का जभी त्याग कर सके तभी त्याग कर देना चाहिये।
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इसीलिये सृष्टि के आदि में सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और सनातन- ये चार त्यागी संन्यासी ही उत्पन्न हुए। भगवान के वामन, कपिल, दत्तात्रेय, ऋषभदेव आदि बहुत-से अवतारों ने त्याग का ही उपदेश दिया है। त्याग ही ‘साधन’ है इसीलिये मनुष्य को ही साधक कहा गया है।
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बहुत-से लोग कहते हैं गृहस्थ-धर्म यदि निष्कामभाव से किया जाय तो सर्वश्रेष्ठ है। किन्तु ये रोचक और श्रुतिमधुर शब्द हैं, जो पूर्वजन्म की संचित वासनाओं के अनुसार सर्वत्याग करने में समर्थ नहीं हो सकते, उनके आश्वासन के निमित्त ये शब्द हैं। जैसे मांस खाने की जो अपनी वासना का संवरण नहीं कर सकता उसके लिये कहते हैं- ‘यदि मांस खाना ही है तो यज्ञ करके जो शेष बचे उसे प्रसाद समझकर खाओ। ऐसा करने से हिंसा न होगी।
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इन शब्दों में से ही स्पष्ट प्रतीत होता है कि असल में अहिंसा तो वही है जिसमें किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुँचाया जाय, किन्तु तुम उसका पालन नहीं कर सकते तो अपनी वासना को सर्वतोमुखी स्वतन्त्र मत छोड़ दो, उसे संयम में लाओ। कामवासना को संयम में लाने के ही लिये गृहस्थी होने की आज्ञा दी है, उसी को धर्म कहते हैं।
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धर्महीन वासनाएँ तो बन्धन का हेतु हैं ही, किन्तु केवल धर्म भी बन्धन का हेतु है, यदि तुम अपनी वासनाओं को संयम में रखकर धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करते रहोगे तो स्वर्ग का सुख भोगते रहोगे, जन्म-मरण के चक्कर से नहीं छूट सकते। ‘हाँ, यदि मोक्ष की प्राप्ति के उद्देश्य से जो धर्माचरण करोगे तो धीरे-धीरे इन कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाओगे।
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पूर्वजन्म की वासनाओं के अनुसार प्राणी स्वयं इन बन्धनों में फँसता है। कर्दम प्रजापति ने दस हजार वर्ष तक भगवान की अनन्य भाव से भूख-प्यास सहकर और प्राणों का निरोध करके तपस्या की थी। तपस्या से प्रसन्न होकर जब भगवान उनके सम्मुख प्रकट हुए और वरदान माँगने को कहा तब उन्होंने हाथ जोड़े हुए गद्गद कण्ठ से कैसी सत्य बात कही थी।
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उन्होंने कहा- ‘भगवान ! मुझमें और ग्राम्य-पशु में कोई अन्तर नहीं। मैंने कामना से तुम्हारी उपासना की है, मैं काम-सुख का इच्छुक हूँ, यदि आप मुझे वरदान देना ही चाहते हैं, तो मेरे अनुकूल मुझे भार्या दीजिये। यही मैं वरदान माँगता हूँ।’
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दस हजार वर्ष की घोर तपस्या के फलस्वरूप भार्या का वरदान सुनकर भगवान के नेत्रों में जल भर आया और उस विन्दु के गिरने से ही विन्दुसर तीर्थ बन गया। वे अपनी माया की प्रबलता देखकर स्वयं आश्चर्यान्वित हो गये और स्वयं इनके यहाँ देवहूति के गर्भ से कलिपरूप में उत्पन्न हुए।
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भगवान कपिल ने अपने पिता को तथा माता को तत्त्वोपदेश किया और अन्त में वे संसार से संन्यास लेकर भगवान के अनन्य धाम को प्राप्त हुए। इसलिये कपिल भगवान का मत है-
‘यदहरेव विरजेत् तदहरेव
प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा।’
किसी भी आश्रम में क्यों न हो जब उत्कट वैराग्य हो जाय तब सर्व धर्मों का परित्याग करके एक प्रभु के ही पादपद्मों में मन लगाना चाहिये, यही प्राणिमात्र का परम पुरुषार्थ है।
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किन्तु उत्कट वैराग्य भी तो पूर्वजन्मों के परम शुभ संस्कारों से प्राप्त होता है। निमाई के भाई विश्वरूप की अवस्था अब सोलह वर्ष की हो चली। वे साधारण बालक नहीं थे। मालूम पड़ता है वे सत्य अथवा ब्रह्मलोक के जीव थे, जो अपने अपूर्ण ज्ञान को पूर्ण करने के निमित्त योगभ्रष्ट शुचि ब्राह्मण के घर में कुछ काल के लिये उत्पन्न हो गये थे। और लोग इस बात को क्या समझें?
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माता-पिता के लिये तो वे साधारण पुत्र ही थे, माता-पिता का जो कर्तव्य है उसका वे पालन करने लगे। विश्वरूप अपने ममेरे भाई लोकनाथ को छोड़कर और किसी से विशेष बातें नहीं करते थे। लोकनाथ को वे प्राणों से भी अधिक प्यार करते थे। लोकनाथ इनसे साल-छः महीने अवस्था में छोटे थे, वे भी इनमें गुरु की भाँति भक्ति करते थे। दोनों के विचार भी एक-से थे, एकान्त में घण्टों परमार्थ-विषयक बातें होती रहतीं।
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मिश्र जी ने देखा पुत्र की अवस्था सोलह वर्ष की हो चुकी है, इसलिये इसके विवाह का कहीं से प्रबन्ध करना चाहिये। अपने विचार उन्होंने शचीदेवी के सम्मुख प्रकट किये। शचीदेवी ने भी इनकी बात का समर्थन किया। अब माता-पिता विश्वरूप के अनुरूप कन्या की खोज करने लगे।
(क्रमशः)

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