बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १४१/१४४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १४१/१४४*
.
समझ बूझि करि ग्यांन गहि, कछु इक बचन विचारि ।
जगजीवन हरि भगति करि, तब मन लीजै तारि ॥१४१॥
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि हे जीव, सोच समझ कर ज्ञान से कुछ विचार कर अब प्रभु की भक्ति करके इस शरीर व आत्मा का उद्धार कर ।
.
कहि जगजीवन खोजि तन, गुरु गमि सतगुरु बूझि ।
रांम ह्रिदै मंहि राखि हरि, तीन पंच मध्य झूझि ॥१४२॥
संत कहते हैं कि हे जीव तुम अपने अंदर ही गुरु महाराज को पहचानो । हृदय में राम का ध्यान कर पांचों इन्द्रियों व तीनों गुणों को यत्न पूर्वक प्रभु में लगावो ।
.
अम्रित भोजन कीजिये, गुरु प्रसादै ग्यांन ।
जगजीवन त्रिषणा बुझै, परिहरिये बिष आंन ॥१४३॥
संत कहते हैं कि गुरु महाराज के ज्ञान प्रसाद से ही स्वयं को पोषित कीजिये । जिससे तृष्णा रुपी भूख मिटेगी व विषय रुपी विष दूर होगें ।
.
किन हरि नांव सिरै भगति, उतपत्ति आदि अंकूर ।
कहि जगजीवन हर्या रहै, सतगुरु सींचे नूर ॥१४४॥
संत कहते हैं कि प्रभु के नाम से ही भक्ति पूर्ण होती है । वहां से ही उत्पन्न प्रस्फुटन सब होता है । इस प्रकार सतगुरु के आशीर्वाद सिंचन से भक्त जन सदा आनंदमय रहते हैं, तेजोमय रहते हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें