बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १५७/१६०*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १५७/१६०*
.
रांम नांम अक्षरं उभयं, गुरु सिष उपदेशितं ।
जगजीवन सतगुरुं साधं, प्रणम्यं८ पारं क्रितं ॥१५७॥
संत कहते हैं कि राम नाम के दो अक्षर ही गुरु द्वारा शिष्य को उपदेशित किये जाते हैं, और वे दो अक्षर ही साधुजन की कृपा व गुरु को प्रणामं करने से मिले आशीर्वाद से पार करा देते हैं ।
{प्रणम्यं-प्रणम्य(प्रणाम कर)}
.
परम पुरिष परमात्मानं, गुरु गमि सतगुरु लयं ।
जगजीवन जतन साक्ष्यं, दंडव्रत जै जै जयं ॥१५८॥
संत कहते हैं कि गुरुदेव ने हमें सबसे श्रेष्ठ परम पुरुष परमात्मा के सम्मुख किया है। उनका सक्षात्कार कर उन्हें दण्डव्रत कर हम सदा उनकी जय करें ।
.
अग्यांनं देहे न दग्धं, ग्यांनिनं नांम नृपषं ।
कहि जगजीवन शुद्ध बुद्धं, गुरु भगति सिषिनि सिषं ॥१५९॥
संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि अग्यान नाशकर्ता नहीं है । किंतु ज्ञान का अभिमान विनाशक है । संत कहते हैं कि शुद्ध बुद्धि से गुरु की भक्ति व ज्ञान शिष्य को सीखना चाहिए ।
.
सतगुरु सबद सिरै मन्त्रं, हरि हरि दिक्षा रांम ।
कहि जगजीवन कांनि गुरु१, लागि कह्या भजि रांम ॥१६०॥
संत कहते हैं कि सद्गुरु महाराज के शब्द ही प्रयोजन है मंत्र है व प्रभु स्मरण उसमें प्रवृत होना अर्थात दीक्षा है । हे जीव मर्यादापूर्वक बहुत आदरपूर्वक जो गुरु महराज ने कहा है वह करें व राम भजन करते रहें ।
(१. कांनि गुरु - गुरु से लज्जा या संकोच मान कर)
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें