बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

*२. स्मरण का अंग ~ २५/२८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ २५/२८*
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सुमिरन करतां ऊपजै, ग्यांन ध्यांन मतिसार ।
जगजीवन सो कीजिये, सुमिरन बारंबार ॥२५॥
संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि भगवन्नाम स्मरण से ज्ञान ध्यान बुद्धि विवेक उत्पन्न होता है अतः बार बार स्मरण कीजिए ।
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सुरतै सुमिरन कीजिये, मोर मगन की नांइ२ ।
जगजीवन तो देखिये, निरगुण सो घट मांहि ॥२६॥
संत कहते हैं कि बड़े यत्न से ध्यान से स्मरण उस प्रेमोन्मत्त मयूर की भातिं स्मरण करें जिसमें वह स्वयं को भी भूलकर नृत्य करता है । तब ही उस हृदयस्थ प्रभु जो सभी गुणों से परे हैं के दर्शन होंगे ।
(२. मोर मगन की नांइ-प्रेमोनमत्त मयूर के समान)
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अझूंठ कोड़ी३ नीझर झरे, रोम रोम रस नीर ।
एक तार सुमिरन करैं, जगजीवन ते थीर४॥२७॥
जो सिर्फ सब तरफ से ध्यान हटाकर उस एक प्रभु का ही धैर्य से ध्यान करते हैं, संत कहते हैं कि उनके लिये बहुमूल्य हीरों रुपी कृपा का स्त्रोत बह रहा है रोम रोम उस कृपा रस से भरा है ।
{३. अझूंठ कोड़ी-महँगी मुद्रा(सिक्का) के तुल्य}
{४. थीर-स्थिर(=स्थितप्रज्ञ महात्मा)}
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(इन) पंचनि का सुर एक करि, सदा एकरस होइ ।
जगजीवन हरि एक भजि, दूजी दुरमति५ खोइ ॥२८॥
संत कहते है पांचों ज्ञानेन्द्रियों को एक दिशा में स्थित करें व सदा यह ही अवस्था रखें एक ईश्वर का भजन करें और सारी दुर्बुद्धि दूर रखें ।
{५. दुरमति-दुर्मति(=दुर्बुद्धि)}
(क्रमशः)

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