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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ २९/३२*
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इन पंचन की एक धुनि, एक सुरति लै एक ।
जगजीवन एकै रहै, परहरि कथा अनेक ॥२९॥
संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि पांच इन्द्रियों का एक ही स्वर है राम का नाम । एक ही ध्यान है व एक ही लय है राम का नाम । संत कहते हैं कि हे जीव, अन्य सब को छोड़कर एक ईश्वर के ही होकर रहो ।
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सुरता ही सुमिरन करै, सुरता वक्ता होई ।
कहि जगजीवन नांम की, महिमा जांणै सोइ ॥३०॥
संत कहते हैं कि ध्यान में भी स्मरण हो वाणी में भी स्मरण हो जो ऐसा करते हैं, वे ही भगवन्नाम की महिमा जान पाते हैं सम्मझ पाते हैं।
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सुर मंहि सुमिरन रांमजी, सुरता सुरते गाइ ।
कहि जगजीवन सौंज६ सब, लै उमड़ावै ताहि ॥३१॥
संत कहते हैं कि जब भी ध्यान की स्थिति आती है तो ईश्वर का ही ध्यान करें गायन भी प्रभु का ही करें तब ऐसा करने से सभी पूजा के साधन संपन्न हो जायेंगे । (६. सौंज-पूजा के साधन)
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अरध७ नांव की नांम ना, नौ खण्ड पृथ्वी मांहि ।
जगजीवन जांनै सकल, क्यों चित्त आंणै नांहि७ ॥३२॥
संत कहते हैं कि राम नाम के अर्ध नाम अर्थात आधे जैसा दिव्य, पवित्र आशीर्वाद नवखण्ड युक्त पृथ्वी में कोई नहीं है यह बात सब जानते हैं फिर इस बात का ध्यान क्यों नहीं रखते की हमें तो स्मरण करना ही है ।
(७-७. महात्मा साधक को उपदेश कर रहे हैं- “तुम संसार के किसी भी कोने में चले जाओ, तुम को ‘राम’ के अर्ध भाग जितना भी कोई उत्तम पदार्थ नहीं मिलेगा, अतः तुम उस नाम का स्मरण करने में क्यों संकोच कर रहे हो !”
तुल. श्रीदादूवाणी-
दादू सब सुख स्वर्ग पयाल के, तोल तराजू बाहि ।
हरि सुख एक पलक का, ता सम कह्या न जाहि ॥
-सुमिरण को अंग)
(क्रमशः)

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