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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ ५/८*
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रोम रोम आगै मगन, सकल अंग प्रकास ।
ए सब रसनां ना भये, सु कहि जगजीवनदास ॥५॥
संतजगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि प्रभु भजन में रोम रोम लीन हो गया है । व सभी अंग प्रेम से पुलकित हैं । अब सभी रोम जिह्वा हो जायें और उन सब से हरि नाम जप हो तो कैसा अपूर्व आनन्द होगा !
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हरिजन के हरि हैं हरि, हरि बिन बोलै नांहि ।
कहि जगजीवन हरि भगत, हरि हैं जा कै मांहि ॥६॥
संत कहते हैं कि वे ही प्रभु के भक्त हैं जिनके अतंर में प्रभु का निवास है । उन्हीं बंदों के ही हरि हैं, जो उनके नाम के बिना कुछ भी नहीं बोलते है ।
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हरिजन के हरि हैं हरि, रोम रोम सब सांस ।
सेवग नांव न बीसरै, सु कहि जगजीवनदास ॥७॥
संत कहते हैं कि प्रभु भक्तों के आप प्रभु ही हैं । आप उनके रोम रोम में, हर सांस में व्याप्त हैं । उनके सेवक उनका नांम कभी नहीं भूलते ऐसा जगजीवनदास जी कहते हैं ।
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धुनि मांही हरि हरि धुनि, चित्त मंहि रांम निवास ।
अंग मंहि अविगत एहि फल, सु कहि जगजीवनदास ॥८॥
संत कहते हैं कि हर तरफ हरि नाम की ध्वनि है, ध्यान में राम जी का स्थान है । प्रत्येक अंग में इसका परिणाम दिखे ऐसी स्थिति के बारे में ही जगजीवनदास जी कहते हैं ।
(क्रमशः)

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