सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

*माया जड़ चेतन का अंग १०६*(५/८)* =

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*दादू केते जल मुए, इस जोगी की आग ।*
*दादू दूरै बंचिये, जोगी के संग लाग ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
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*माया जड़ चेतन का अंग १०६*
काचा ऊगै कुंभनी१, पाका काया माँहिं । 
जल दल२ दीसे जीवते, कहो कौन विधि खाँहिं ॥५॥ 
कच्चा बीज पृथ्वी१ से उगता है और जल निकलता है । पक जाने पर रजवीर्य बनकर शरीर से संतान रूप में उगते हैं । अत: अन्न२ जल तो जीवित ही भासते हैं, फिर कहो इनको किस प्रकार खाया जाय? अर्थात ये नष्ट नहीं होते चेतन ही हैं । 
माया अमर मरे नहीं, बाली१ बल न घटाहिं । 
रज्जब रिधि२ दारू३ दशा, दग्धी दुर्ग४ उडाहिं ॥६॥
माया अमर है मरती नहीं, जलाने१ पर भी इसका बल नहीं घटता । जैसे बारूद३ जलाने पर भी किले४ को उखाड़ देती है, वैसे ही माया२ जली हुई भी मन को प्रभु से हटा देती है । 
सितिया१ शक्ति२ समान है, संकट स्वाद सु पुष्टि ।
माया मिश्री मर्दत दिप३ हिं, देखै को दिव्य दृष्टि ॥७॥ 
मिश्री१ और माया२ दोनों बराबर हैं है, दोनों ही दु:ख में स्वाद और पुष्टि देती हैं तथा दोनों ही मर्दन करने पर प्रदीप्त३ होती हैं । इनकी इस चेष्टा को कोई दिव्य वाला ही देखता है ।
रज्जब औषधि रोग लड़ाई, 
जड़ों माँहिं चेतन गति१ पाई । 
तो मुवै मूवा सो कोई नाँहि, 
जीवन गति२ दीसे सब माँहिं ॥८॥ 
औषधि और रोग का युद्ध होता है, यह देखो जड़ों में भी चेतन की चेष्टा१ मिलती है, तब मरने पर भी वह मरने वाला कोई नहीं मरता कारण-सभी में जीवित रहने की-सी चेष्टा२ भासती है ।
(क्रमशः)

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