सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

= १९५ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
१९५ - भ्रम विध्वँसन । प्रतिताल
जग अँधा नैन न सूझै, जिन सिरजे ताहि न बूझै ॥टेक॥
पाहण की पूजा करै, करि आतम घाता ।
निर्मल नैन न आवई, दोजख दिशि जाता ॥१॥
पूजैं देव दिहाड़िया, महा - माई मानैं ।
प्रकट देव निरँजना, ताकी सेव न जानैं ॥२॥
भैरूँ भूत सब भरम के, पशु प्राणी धावैं ।
सिरजनहारा सबन का, ताको नहिं पावैं ॥३॥
आप स्वारथ मेदनी१, का का नहिं करही ।
दादू साचे राम बिन, मर मर दुख भरही ॥४॥
उपास्य सम्बन्धी भ्रम दूर कर रहे हैं - जगत् के प्राणी अज्ञान से अँधे हो रहे हैं, उनके नेत्रों से उनका हित अनहित भी नहीं दीखता और जिन प्रभु ने उन्हें उत्पन्न किया है, उनको भी वे नहीं समझ पाते, इसीलिए ....
.
पत्थर की पूजा करते हैं और बलि देने के निमित्त बकरे आदि का घात करते हैं । निर्मल साधन इनकी दृष्टि में नहीं आता अर्थात् नहीं करते । इसी कारण नरक की ओर जाते दिखाई दे रहे हैं । 
.
भैरूँ आदि देवताओं को पूजते हैं, महामाई को मानते हैं और बुरी दशा को प्राप्त होते हैं किन्तु जो सब विश्व में प्रकट निरंजन देव है, उनकी भक्ति करना नहीं जानते । 
.
भैरूँ, भूतादि सब भ्रम मय हैं, पशुओं के समान प्राणी ही उनकी उपासना करते हैं । इसीलिए सर्व विश्व के रचयिता जो प्रभु हैं, उनको न प्राप्त होकर जन्मादि प्रवाह में ही बहते हैं । 
.
अपने स्वार्थ सिद्धि के लिये पृथ्वी१ के प्राणी क्या - क्या नहीं करते ? सभी कुछ कर डालते हैं । किन्तु सत्य - स्वरूप राम की उपासना बिना बारँबार मर - मर कर जन्मते हैं और नाना क्लेश भोगते हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें