रविवार, 16 फ़रवरी 2020

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*धनि धनि साहिब तू बड़ा, कौन अनुपम रीत ।*
*सकल लोक सिर सांइयां, ह्वै कर रह्या अतीत ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
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साभार ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी 
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु,* *श्रद्धा विश्वास*
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एक सच्चा विश्वासी भक्त था । उसे हरि दर्शन के लिये बड़ी व्याकुलता थी । वह सब से प्रश्न करता कि शीघ्र भगवान् के दर्शन कैसे हो । उसकी इस स्थिति का पता एक ठग को लग गया । वह साधु के भेष में आकर उससे बोला - "मैं आज ही तुम्हें भगवान् के दर्शन करा दूंगा । तुम अपना सारा समान बेचकर मेरे साथ चलो । भक्त ने उसके कहने के अनुसार ही किया । वन में एक कूप पर ले जाकर ठग बोला - "तुम इन रुपयों को तो एक और रख दो और इस कूप में देखो भगवान् के दर्शन हो जायेंगे । ज्यों ही विश्वासी ने कुऐं में देखा ठग ने उसे कूप में गिरा दिया, भक्त के कुछ भी चोट नहीं आई और भगवान् के दर्शन भी हो गये । ठग रुपये लेकर चल दिया । 
भगवान् ने सिपाही का भेष धरकर उसे पकड़ लिया और भक्त के पास लाकर उसी की ठगी का सब हाल बता दिया । किन्तु भक्त ने कहा - "चाहे ये कोई भी क्यो न हो, मुझे तो इनके द्वारा ही भगवान् के दर्शन हुये हैं । इसलिये मेरे तो ये गुरु ही हैं अत: इन्हें छोड़ दें । भक्त की यह बात सुनकर ठग का हृदय भी बदल गया । वह भी भक्त तथा भगवान् के संग से सच्चा भक्त बन गया । इस कथा से सूचित होता है कि ईश्वर विषयक विश्वास अवश्य फलता है ।
फल होता है विश्वास का, अवश्य सशय नांहिं ।
ठग द्वारा भी हरि मिले, गिरत कूप के मांहि ॥२३१॥ 
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^^

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