रविवार, 16 फ़रवरी 2020

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*दादू वाणी प्रेम की, कमल विकासै होहि ।*
*साधु शब्द माता कहैं, तिन शब्दों मोह्या मोहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ शब्द का अंग)*
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साभार ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी 
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु,* *मधुर वचन*
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जरत्कारू के पुत्र आस्तीक ने जनमेजय के सर्प यज्ञ को अपने स्तुति रूप मधुर वचनों से बंद कराया था । द्वारपालों ने आस्तीक मुनी को यज्ञशाला में जाने से रोक दिया । वे भीतर प्रवेश करने के लिये यज्ञ की स्तुति करने लगे । सूत की भविष्यवाणी के द्वारा राजा को भी ज्ञान था कि किसी ब्रह्माण के कारण यह यज्ञ पूर्ण नहीं होगा । तो भी आस्तीक की स्तुति सुन कर जनमेजय ने उन्हें भीतर आने की आज्ञा दे दी । 
यज्ञ मण्डप में जाकर आस्तिक अपने मधुर वचनों से यजमान, ऋत्विज, सभासद् तथा अग्नि की ओर भी स्तुति करने लगा । इससे सब प्रसन्न हो गये और राजा ने वर मांगने को कहा । आस्तीक ने सर्पयज्ञ बन्द करना ही वर मांगा और उसका वह वर सबने स्वीकार किया । सर्पयज्ञ बन्द कर दिया । इससे सूचित होता है कि - मधुर वचन से अवश्य सफलता मिलती है ।
मधुर वचन से सफलता, मिलती संशय नांहि ।
सफल भये आसतीक मुनि, सर्पयज्ञ के मांहि ॥६४॥ 
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^^

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