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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*१. गुरुदेव कौ अंग ~ १६१/१६४*
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नांम हि अनंत पुरान मत, नांम हि अनंत प्रकास ।
नांम हि अजपा जाप हरि, सु कहि जगजीवनदास ॥१६१॥
संत कहते है नाम ही अनंत अर्थात सभी पुराणों में वर्णित है । नाम ही
ज्ञान का प्रकाश है । नाम स्मरण हर सांस के साथ चलने वाला
अजपा जाप है । ऐसा सभी संत कहते हैं ।
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यहु उपदेश अगाध गति, दिक्षा सिक्षा नांम ।
कहि जगजीवन जे पिछांणै, ते नित बिलसैं रांम ॥१६२॥
संत कहते हैं कि गुरु उपदेश गहन प्रक्रिया है । दीक्षा व शिक्षा ये सब तो ऊपरी है सही शिक्षा गुरु मत व सही दीक्षा गुरु आज्ञा पालन ही है जो इस बात को जान जाते हैं वे नित्य प्रभु कृपा से अभिभूत होते हैं ।
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प्रणपति२ अविगति रांमजी, प्रणपति गुरु चित्त लाइ ।
कहि जगजीवन साध सब, प्रणपति परसै ताहि ॥१६३॥
संत कहते हैं कि उन राम जी को जिनकी लीला का कोइ पार नहीं पाता, गुरु महाराज द्वारा दिखाये जाने पर प्रणामं करते है । संत कहते हैं कि उन्हें सभी साधु जन प्रणाम द्वारा ही पाते हैं । विनय भाव की प्रधानता है । (२. प्राणपति-प्रणिपत्य = प्रणाम कर)
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जै जै अबिगति देव हरि, गुरु गोबिन्द कर जांणि ।
कहि जगजीवन साध सब, बंदि चरण चित आंणि३॥१६४॥
संत कहते हैं कि हे प्रभु आपकी जय हो हम गुरु सानिध्य से आपको जान पाये उन्हें भी प्रणाम संत कहते है सभी साधु जन उन्हें मर्यादा पूर्वक प्रणाम करके चरणों का ध्यान लगाते हैं । (३. आंणि-अन्य(दूसरा) अर्थात स्वचित्त में किसी अन्य का ध्यान न करते हुये गुरुचरणों की वंदना करनी चाहिये)
॥इति गुरुदेव कौ अंग सम्पूर्ण॥
(क्रमशः)

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