शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

*शक्ति उभय गुणी का अंग १०५*(५/९)* =

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*रोक न राखै, झूठ न भाखै, दादू खरचै खाइ ।*
*नदी पूर प्रवाह ज्यों, माया आवै जाइ ॥*
===================
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
.
*शक्ति उभय गुणी का अंग १०५*
माया ब्रह्म ब्रह्म सोई माया, 
काया काष्ठ भेद भल भाया । 
जागे ज्योति सोचते कट्ठे, 
समझौ नहिं सो मूरख शट्ठे ॥५॥ 
माया ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही माया है । शरीर और काष्ठ के द्वारा यह रहस्य हमने भली प्रकार प्राप्त कर लिया है, काष्ठ की अग्नि की ज्योति नहीं जगती तब तक काष्ठ और अग्नि इकट्ठे ही रहते है । ज्योति जग्ने पर काष्ठ भष्म हो जाता है । वैसे ही शरीर में ब्रह्म ज्ञान रूप ज्योति नहीं जगती तब तक माया और ब्रह्म इकट्ठे ही रहते है । ज्ञान ज्योति जगने पर माया का अभाव हो जाता है जो इस रहस्य को नहीं समझता वह मूर्ख और दुष्ट है । 
अठारह भार उभयगुणी, हरिसिद्धि१ गुण दोय । 
याही में जीवन जड़ी, याहि में मृत्यु होय ॥६॥ 
अठारह भार वनस्पति का अग्नि दो गुण वाला है, वैसे ही माया१ दो गुण वाली है, वनस्पतियों का अग्नि उनमें अंतर्लीन होता है तब तो उनका जीवन है और प्रकट होता है तब उसको भस्म कर डालता है । वैसे ही इस माया में जीवों के लिये जीवन बूंटी है अर्थात माया का उपयोग परमार्थ में करने से ब्रह्म प्राप्ति रूप नित्य जीवन प्राप्त होता है और स्वार्थ करने में इसी माया के सम्बन्ध से बारम्बार मृत्यु होती है । 
इक वह्नि रू विभूति में, दो दो गुण इन दोय ।
एक बधै इक बालिये, वन वपु देखो जोय ॥७॥ 
एक अग्नि और माया इन दोनों में दो-दो गुण है, अग्नि एक गर्मी देना रूप गुण से वन को बढाता है और दूसरे प्रकट होकर वन को जला देता है । वैसे ही विचार करके देखो, माया का परमार्थ में उपयोग करने से तो शरीर की उन्नति करती है और स्वार्थ से नष्ट कर देती है । 
रज्जब माया चित्त राम, वैरी मीत न कोय । 
कुकृत उपजे इनहुं सौ, इनसौं सुकृत होय ॥८॥ 
माया और मन के समान शत्रु - मित्र कोई नहीं है । इनसे ही कुकर्म होते हैं और इनसे ही पुण्य कर्म होते हैं । 
जिह्वा रूपी जीव है, दांत मयी है शक्ति१ । 
ये ही शस्त्र सनाह२ ये, समझ्या साधू मत्ति३ ॥९॥ 
जीव जिह्वा के समान है और माया१ दातों के समान है । जैसे जिह्वा को काटने के शस्त्र दांत है और रक्षक कवच२ भी दांत ही हैं । वैसे ही जीव की नाशक भी माया है और रक्षक भी माया ही है । यह रहस्य हमने संतों की बुद्धि३ द्वारा समझा है । 
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित उभय गुणी का अंग १०५ समाप्तः ॥सा. ३२६४॥ 
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें