शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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१९३ - उपदेश । पँजाबी त्रिताल
पँडित, राम मिलै सो कीजै,
पढ पढ वेद पुराण बखानैं, 
सोइ तत्व कह दीजै ॥टेक॥
आतम रोगी विषम बियाधी, 
सोई कर औषधि सारा ।
परसत प्राणी होइ परम सुख, 
छूटै सब सँसारा ॥१॥
ए गुण इन्द्री अग्नि अपारा, 
ता सन जलै शरीरा ।
तन मन शीतल होइ सदा सुख, 
सो जल न्हाओ नीरा ॥२॥
सोई मारग हमहिं बताओ, 
जेहि पँथ पहुंचै पारा ।
भूल न परै उलट नहिं आवै, 
सो कुछ करहु विचारा ॥३॥
गुरु उपदेश देहु कर दीपक, 
तिमिर१ मिटै सब सूझै ।
दादू सोई पँडित ज्ञाता, 
राम मिलन की बूझै ॥४॥
पँडित जगजीवनजी को उपदेश कर रहे हैं - हे पँडित ! जिससे राम प्राप्त हो, वही उपाय करो और वेद पुराणादि पढ़ - पढ़ कर विद्वान् लोग जिस परब्रह्म तत्व का व्याख्यान करते हैं, उसी तत्व की बात हमारे को कहो । 
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जीवात्मा - रोगी के जन्मादि रूप भयँकर रोग लगा है, उसकी जो सार रूपी औषधि है, वही करो, जिससे प्राणी प्रभु से मिलकर परम सुखी हो जाय । 
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ये विषय और इन्द्रिय अपार अग्नि रूप है, उनसे शरीर जल रहा है । जिस जल के स्नान से तन - मन शाँत होकर नित्य सुख प्राप्त हो उसी जल में स्नान करो और... 
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जिससे प्राणी सँसार के पार पहुंच सके और भूलकर भी उसमें वापस न लौट सके अर्थात् पुनर्जन्म न हो, ऐसा मार्ग हमें बताओ और उसी का कुछ विचार करो । 
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सद्गुरु उपदेश - दीपक अन्त:करण रूप हाथ में रक्खो, जिससे अज्ञान अन्धकार१ नष्ट होकर सब कुछ भासने लगे । हमारे मत से तो वही ज्ञानी पँडित है, जो राम के मिलने का साधन सम्यक् प्रकार समझता - बूझता हो । यह पद पँ. जगजीवनजी को आमेर में कहा था । प्रसंग कथा दृ - सु - सि - ११ - १७ में देखो।
(क्रमशः)

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