रविवार, 23 फ़रवरी 2020

निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग ५८/६१

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । 
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ 
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी 
(श्री दादूवाणी ~ ८. निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग) 
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*॥पतिव्रत॥* 
*दादू रहता राखिये, बहता देइ बहाइ । 
बहते संग न जाइये, रहते सौं ल्यौ लाइ ॥५८॥ 
निश्चल ब्रह्म तो एक ही है । प्रपञ्च तो मायिक होने से चल रहा है अर्थात् नष्ट होने वाला है । अतः निश्चल ब्रह्म में ही अपने मन को लीन करो । जो पदार्थ नाशवान् दुःख देने वाले हैं उनमें अपने मन को आसक्त मत करो । अर्थात् उनसे प्रेम मत करो क्योंकि उनकी प्रीति शाश्वत रहने वाली नहीं है । वेदान्त संदर्भ में लिखा है कि- सुख देने वाले पदार्थों में प्राणियों का जो प्रेम है वह सावधिक(कुछ ही दिन) रहने वाला है । आत्मा का जो प्रेम है वह शाश्वत प्रेम है । क्योंकि आत्मा सुख रूप है परम प्रेम का आस्पद(स्थान) माना गया है । अतः उसी में प्रेम करो । आत्मा का स्वलक्षण भी आनंद रूप ही माना है । 
*जनि बाझैं काहू कर्म सौं, दूजै आरंभ जाइ ।* 
*दादू एकै मूल गहि, दूजा देइ बहाइ ॥५९॥* 
काम्य कर्म सुख दुःख फल को देने वाले हैं, अतः उनको त्याग कर जगत् का कारण एक शुद्ध ब्रह्म है उसका ही अनुसंधान करें । भागवत में कहा है कि हे पुत्रों जो हमारे लोक में जाने की कामना करता है सो हमारा अनुग्रह रूप प्रयोजन का आशय यह है कि पिता पुत्र को गुरु शिष्यों को राजा प्रजा को ऐसी शिक्षा दे । परन्तु उपदेश देने पर भी सिखाया हुआ विषय न करे तो सिखाने वाले को क्रोध नहीं करना चाहिये । क्योंकि जो पुरुषतत्त्व को नहीं जानते वे प्राय कर्मों को अच्छा समझकर कर्म करने में लगते हैं । उनको फिर सकाम कर्म में नहीं लगाना चाहिये । क्योंकि सकाम कर्म में लगाना अन्धे को कूए में डालने के समान है । जो बहुत ही कामना करता है और उसकी दृष्टि अच्छा बुरा को समझाने में अंधी है और धन की चेष्टा करता है । किंचित् सुख के कारण वैर करना, वह मुर्ख इस बात को नहीं जानता कि अन्त में मुझे दुःख प्राप्त होगा । वह तो दुःख को ही सुख मानता है । ऐसे कुबुद्धिमानव अविद्या में ही पड़े रहते हैं । उनको देखकर कौन सदय मानव जानबूझकर इस विषय में उनको प्रवृत्त करेगा । जैसे अन्धा मनुष्य बुरे मार्ग में पड़ जाय तो उसको बुरे मार्ग में जाता हुआ देखकर क्या कोई विद्वान् अन्धे को उसी मार्ग में जाने का उपदेश करेगा? नहीं । 
*बावें देखि न दाहिने, तन मन सन्मुख राखि ।* 
*दादू निर्मल तत्त्व गह, सत्य शब्द यहु साखि ॥६०॥* 
ये सुख दुःख आने जाने वाले हैं । इनकी उपेक्षा करके परमात्मा के सन्मुख होकर सच्चिदानन्द ब्रह्म को ही भजो । इस विषय में ब्रह्म का साक्षात्कार किये हुए संत ही प्रमाण है । गीता में कहा है कि- हे कुन्तीपुत्र सर्दी गर्मी सुख दुःख के देने वाले हैं । इन्द्रिय संयोग तो क्षणभंगुर और अनित्य है, उनको तू सहन कर । 
सुख दुःख को समान समझने वाले धीर पुरुष को इन्द्रियों के विषय व्याकुल नहीं कर सकते । वह ही मोक्ष के योग्य है । मुण्डक में कहा है कि- जो भोगों का आदर करने वाला मानव उनकी कामना करता है वह उन कामनाओं के कारण उन-उन स्थानों में पैदा होता है । जो पुरुष पूर्ण काम है उसकी सारी कामनायें यही पर सर्वथा विलिन हो जाती है । जो संपूर्ण कामनाओं को त्यागकर निःस्पृह निर्मम होकर कर्म करता है वह ही शान्ति को प्राप्त होता है । 
*दादू दूजा नैन न देखिये, श्रवणहुँ सुने न जाइ ।* 
*जिह्वा आन न बोलिये, अंग न और सुहाइ ॥६१॥* 
चन्द्रोदय होने पर चकोर चन्द्रदर्शन को छोड़कर अन्य का दर्शन नहीं करता क्योंकि चकोर की चन्द्र में प्रीति है । मृग वीणानाद को छोड़कर अन्य नाद को नहीं सुनता । इसी प्रकार साधक भी ब्रह्म से भिन्न किसी अन्य का श्रवण मनन नहीं करता । किन्तु सर्वत्र ब्रह्म को ही देखता सुनता है । जिव्हा से हरि नाम ही रटता रहता है । अर्थात् ब्रह्म के बिना अन्य की इच्छा नहीं करता । उपनिषद में- उस एक ब्रह्म को ही जानो और सब वाणी को त्याग दो । 
हे बादल ! चाहे तूं पानी दो या नहीं, फिर भी मेरा चित्त तुम्हारे में ही लगा हुआ है । क्योंकि भयंकर प्यास से मर जाना अच्छा है लेकिन जल के लिये और से याचना करना अच्छा नहीं है । 
(क्रमशः)

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