रविवार, 16 फ़रवरी 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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१८७ - हितोपदेश विनती । शूल ताल
सन्मुख भइला रे, तब दुख गइला रे, 
ते मेरे प्राण अधारी ।
निराकार निरंजन देवा रे, 
लेवा तेह विचारी ॥टेक॥
अपरँपार परम निज सोई, 
अलख तोरा विस्तारँ ।
अँकुर बीजे सहज समाना रे, 
ऐसा समर्थ सारँ ॥१॥
जे तैं कीन्हा कीन्ह इक छीन्हा रे, 
भइला ते परिमाणँ ।
अविगत तोरी विगति न जाणूं, 
मैं मूरख अयानँ ॥२॥
सहजैं तोरा ए मन मोरा, 
साधन सौं रंग आई ।
दादू तोरी गति नहिं जाने, 
निर्वाहो कर लाई ॥३॥
हितकर उपदेश करके विनय कर रहे हैं - जो भजन द्वारा मेरे प्राणाधार प्रभु के सन्मुख होंगे, तब उनके दु:ख चले जायेंगे । वे निरंजन देव निराकार हैं, अपरँपार हैं, और वे ही सबके अत्यँत निजी हैं । 
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हे मन इन्द्रियों के अविषय प्रभो ! यह सब विस्तार आप ही का है । जैसे बीज में अँकुर समाया हुआ रहता है, वैसे ही आपके सहज स्वरूप में सब सँसार समाया हुआ है, आप ऐसे समर्थ और सँसार के सार रूप हैं । 
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जो आपने किया है, वह वास्तव में किसी - किसी महापुरुष ने ही पहचाना है और जिनने पहचाना है, वे आपके समान ही हो गये हैं । हे मन इन्द्रियों के अविषय प्रभो ! मैं तो आपकी विशेष रूप गति को नहीं जानता, कारण, मूर्ख और अज्ञानी हूं । 
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साधन - रँग से रँगा जाकर यह मेरा मन सहजे - सहजे आप का हुआ है, तो भी मैं आपकी गति नहीं जान पाता ! अत: आप ही मेरा हाथ पकड़ कर मुझे निभाओ ।
(क्रमशः)

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