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*शब्दों मांहिं राम-रस, साधों भर दीया ।*
*आदि अंत सब संत मिलि, यों दादू पीया ॥*
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साभार ~ Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*२२. विद्याव्यासंगी निमाई*
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उन दिनों गौरांग व्याकरण के ‘पंचीटीका’ नामक ग्रन्थ को समाप्त कर चुके थे, इन्होंने उसके ऊपर एक सरल टिप्पणी भी लिखी। इनकी की हुई टीका के ऊपर टिप्पणी विद्यार्थियों के बड़े ही काम की थी, बहुत शीघ्र ही विद्यार्थियों में इनकी टिप्पणी का प्रचार हो गया और बड़े-बड़े विद्वानों ने इनकी पाण्डित्यपूर्ण टिप्पणी की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की। यहीं तक नहीं, उस टिप्पणी का नवद्वीप से बाहर अन्य देशों के छात्रों में भी प्रचार हुआ और सभी ने इनके पाण्डित्य की सराहना की।
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इस प्रकार इनकी प्रशंसा दूर-दूर तक फैल गयी। व्याकरण के साथ ही ये अलंकार के भी पाठ सुनते अैर उन्हें सुनते-सुनते ही हृदयंगम करते जाते थे। इस प्रकार ये थोड़े ही समय में व्याकरण तथा अलंकार में प्रवीण हो गये। उन दिनों नवद्वीप में जो न्याय का बोलबाला था। पण्डित व्याकरण पढ़कर न्याय नहीं जानता, उसका विशेष सम्मान नहीं होता था।
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न्याय में उन दिनों पं. वासुदेव सार्वभौम नदिया के राजा समझे जाते थे। न्याय में उन्हीं की पाठशाला सर्वश्रेष्ठ समझी जाती थी और उसमें सैकड़ों छात्र पढ़ते थे। उस पाठशाला के पढे़ हुए छात्र आज संसारप्रसिद्ध पण्डित माने जाते हैं। नव्यन्याय की जो टीका ‘जागदीशी’ के नाम से न्याय का ही परिचय देती है उसी के प्रणेता पं. जगदीश के भी गुरु भवानन्द इसी पाठशाला के छात्र थे।
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‘दीधिति’ नामक जगत्प्रसिद्ध ग्रन्थ के प्रणेता पं. रघुनाथ जी भी उन दिनों इसी पाठशाला में पढ़ते थे। इस प्रकार वह पाठशाला न्याय का एक भारी केन्द्र बनी हुई थी। निमाई भी पाठशाला में जाकर न्याय का पाठ सुनने लगे। ऐसी पाठशालाओं में प्रत्येक छात्रों के पृथक पाठ नहीं चलते हैं। दस-पाँच पाठ होते हैं, अपनी जैसी योग्यता हो, उसी पाठ को जाकर सुनते रहो, बस, यही पढ़ाई थी।
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सैकड़ों छात्र और पण्डित पाठ सुनने आते हैं। अध्यापक उनमें से बहुतों का नाम-पता भी नहीं जानते। वे पाठ सुनकर चले जाते हैं। आज भी काशी आदि बड़े-बड़े स्थानों की प्राचीन ढंग की पाठशालाओं में ऐसा ही रिवाज है। निमाई भी पाठशाला में जाकर पाठ सुन आते।
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सार्वभौम महाशय का उन दिनों इनके साथ कोई विशेष परिचय नहीं हुआ, किन्तु इनकी चंचलता, चपलता, वाकपटुता और लोकोत्तर मेधा के कारण मुख्य-मुख्य छात्र इनसे बहुत स्नेह करने लगे। वे यह भी जानने लगे कि न्याय-जैसे गम्भीर विषय को निमाई भलीभाँति समझता है। वह अन्य बहुत-से छात्रों की भाँति केवल सुनकर ही नहीं चला जाता।
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पीछे जिनका हम उल्लेख कर चुके हैं वे ही ‘दीधिति’ महाग्रन्थ के रचयिता पण्डित रघुनाथ उन दिनों सभी छात्रों में सर्वश्रेष्ठ समझे जाते थे। उन्हें स्वयं भी अपनी तर्कशक्ति और विलक्षण बुद्धि का भरोसा था। उनकी उस समय से ही यह प्रबल वासना थी कि मैं भारतवर्ष में एक प्रसिद्ध नैयायिक बनूँ। सम्पूर्ण देश में मेरी विलक्षण बुद्धि की ख्याति हो जाय।
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जो जैसे होनहार होते हैं, उनकी पहले से ही वैसी भावना होती है। रघुनाथ की भी सर्वमान्य बनने की पहले से ही वासना थी। रघुनाथ के साथ निमाई का परिचय पहले से ही हो चुका था। उनके साथ इनकी गाढ़ी मैत्री भी हो चुकी थी। निमाई कभी-कभी रघुनाथ के निवासस्थान पर भी जाया करते और उनसे न्याय सम्बन्धी बातें किया भी करते थे।
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इनकी बातचीत से ही रघुनाथ समझ गये कि यह भी कोई होनहार नैयायिक हैं। वे समझते थे कि मुझसे न्याय में स्पर्धा रखने वाला नवद्वीप में दूसरा कोई छात्र नहीं है। निमाई से बातचीत करते-करते कभी उन्हें खटकने लगता कि यदि यह इसी प्रकार परिश्रम करता रहा, तो सम्भवतया मुझसे बढ़ सकता है। किन्तु उन्हें अपनी बुद्धि पर पूरा भरोसा था, इसलिये इस विचार को वे अपने हृदय में जमने नहीं देते थे।
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एक दिन रघुनाथ को गुरु ने कोई ‘पंक्ति’ लगाने को दी। वह ‘पंक्ति’ रघुनाथ की समझ में ही नहीं आयी। वे दिनभर चुपचाप बैठे हुए उसी पंक्ति को सोचते रहे। तीसरे पहर जाकर वह पंक्ति रघुनाथ की समझ में आयी, उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। गुरु को बताकर वे अपने स्थान पर भोजन बनाने चले गये।
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निमाई का स्वभाव तो चंचल था ही, रघुनाथ को पाठशाला में न देखकर आप उनके निवासस्थान पर पहुँचे। वहाँ जाकर देखा रघुनाथ भोजन बना रहे हैं। लकड़ी गीली है। रघुनाथ बार-बार फूँकते हैं, अग्नि जलती ही नहीं। धुएँ के कारण उनकी आँखें लाल पड़ गयी हैं और उनमें से पानी निकल रहा है। हँसते हुए निमाई ने रघुनाथ के चैके में प्रवेश किया। प्रेम के साथ हँसते हुए बोले- ‘पण्डित महाशय ! आज असमय में रन्धन क्यों हो रहा है।’
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अग्नि में फूँक देते हुए रघुनाथ ने कहा- ‘क्या बताऊँ भाई ! गुरु जी ने एक ‘पंक्ति’ लगाने के लिये दी थी, वह मेरी समझ में ही नहीं आयी। दिनभर सोचते रहने पर अब समझ में आयी, उसे अभी गुरुजी को सुनाकर आया हूँ, इसीलिये भोजन बनाने में देर हो गयी।’ जल्दी से निमाई ने कहा- ‘जरा हम भी तो उस पंक्ति को सुनें। पंक्ति क्या थी आफत थी, जो आप-जैसे पण्डित की समझ में इतनी देर में आयी। जरूर कोई बहुत ही कठिन होगी। मैं भी उसे एक बार सुनना चाहता हूँ।’
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रघुनाथ ने वह पंक्ति सुना दी। थोड़ी देर सोचने के अनन्तर निमाई हँस पड़े और बोले- ‘बस, इसी छोटी-सी ‘पंक्ति’ को इतनी देर सोचते रहे, इसमें है ही क्या?’ जरा आवेश के साथ रघुनाथ जी ने कहा- ‘अच्छा, कुछ भी नहीं है तो तुम्हीं लगाकर बताओ।’ इतना सुनते ही निमाई ने बड़ी ही सरलता के साथ पंक्ति के पूर्वपक्ष की स्थापना की। फिर यथावत एक-एक शंका का समाधान करते हुए उसे बिलकुल ठीक लगा दिया।
(क्रमशः)

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