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*दादू परचा माँगें लोग सब,*
*कहैं हमकौं कुछ दिखलाइ ।*
*समरथ मेरा सांइयाँ, ज्यों समझैं त्यों समझाइ ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ समर्थता का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत {श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।*
*चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवेः नमः ॥*
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*मास्टर का तिरस्कार तथा उनका अहंकार चूर्ण करना*
श्रीरामकृष्ण(मास्टर से)- क्या तुम्हारा विवाह हो गया है?
मास्टर- जी हाँ ।
श्रीरामकृष्ण(चौंककर)- अरे रामलाल, अरे अपना विवाह तो इसने कर डाला । रामलाल श्रीरामकृष्ण के भतीजे और कालीजी के पुजारी हैं । मास्टर घोर अपराधी जैसे सिर नीचा किए चुपचाप बैठे रहे । सोचने लगे, विवाह करना क्या इतना बड़ा अपराध है?
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श्रीरामकृष्ण ने फिर पूछा- “क्या तुम्हारे लड़के-बच्चे भी हैं?”
मास्टर का कलेजा काँप उठा । डरते हुए बोले- “जी हाँ, लड़के-बच्चे हुए हैं ।”
श्रीरामकृष्ण ने फिर दुःख के साथ कहा- “अरे लड़के भी हो गए !”
इस तरह तिरस्कृत होकर मास्टर चुपचाप बैठे रहे । उनका अहंकार चूर्ण होने लगा । कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण सस्नेह कहने लगे, “देखो, तुम्हारे लक्षण अच्छे हैं, यह सब मैं किसी के कपाल, आँखें आदि को देखते ही जान लेता हूँ । अच्छा, तुम्हारी स्त्री कैसी है? विद्या-शक्ति है या अविद्या-शक्ति?”
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ज्ञान क्या है?
मास्टर- जी अच्छी है, पर अज्ञान है ।
श्रीरामकृष्ण(अप्रसन्न होकर)- और तुम ज्ञानी हो?
मास्टर नहीं जानते ज्ञान किसे कहते हैं और अज्ञान किसे । अभी तो उनकी धारणा यही है कि कोई लिख-पढ़ ले तो मानो ज्ञानी हो गया । उनका यह भ्रम दूर तब हुआ जब उन्होंने सुना कि ईश्वर को जान लेना ज्ञान है और न जानना अज्ञान । श्रीरामकृष्ण की इस बात से कि ‘तुम ज्ञानी हो’ मास्टर के अहंकार पर फिर धक्का लगा ।
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*मूर्तिपूजा*
श्रीरामकृष्ण- अच्छा, तुम्हारा विश्वास ‘साकार’ पर है या ‘निराकार’ पर?’
मास्टर मन ही मन सोचने लगे, ‘यदि साकार पर विश्वास हो तो क्या निराकार पर भी विश्वास हो सकता है? ईश्वर निराकार है-यदि ऐसा विश्वास हो तो ईश्वर साकार है ऐसा भी विश्वास कभी हो सकता है? ये दोनों विरोधी भाव किस प्रकार सत्य हो सकते हैं? सफेद दूध क्या कभी काला हो सकता है?’
मास्टर- निराकार मुझे अधिक पसन्द है ।
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श्रीरामकृष्ण- अच्छी बात है । किसी एक पर विश्वास रखने से काम हो जायगा । निराकार पर विश्वास करते हो, अच्छा है । पर यह न कहना कि यही सत्य है, और सब झूठ । यह समझना कि निराकार भी सत्य है और साकार भी सत्य है । जिस पर तुम्हारा विश्वास हो उसी को पकड़े रहो ।
दोनों सत्य हैं, यह सुनकर मास्टर चकित हो गए ।
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यह बात उनके किताबी ज्ञान में तो थी नहीं ! तीसरी बार धक्का खाकर उनका अहंकार चूर्ण हुआ, पर अभी कुछ रह गया था; इसलिये फिर वे तर्क करने को आगे बढ़े ।
मास्टर- अच्छा, वे साकार हैं, यह विश्वास मानो हुआ । पर मिट्टी की या पत्थर की मूर्ति तो वे हैं नहीं ।
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श्रीरामकृष्ण- मिट्टी की मूर्ति वे क्यों होने लगे? पत्थर या मिट्टी नहीं, चिन्मयी मूर्ति ।
चिन्मयी मूर्ति, यह बात मास्टर न समझ सके । उन्होंने कहा- “अच्छा, जो मिट्टी की मूर्ति पूजते हैं, उन्हें समझाना भी तो चाहिये कि मिट्टी की मूर्ति ईश्वर नहीं है और मूर्ति के सामने ईश्वर की ही पूजा करना ठीक है, किन्तु मूर्ति की नहीं !”
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*लेक्चर तथा श्रीरामकृष्ण*
श्रीरामकृष्ण(अप्रसन्न होकर)-तुम्हारे कलकत्ते के आदमियों में यही एक धुन सवार है, -सिर्फ लेक्चर देना और दूसरों को समझाना ! अपने को कौन समझाए, इसका ठिकाना नहीं । अजी समझनेवाले तुम हो कौन? जिनका संसार है वे समझाएँगे ।
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जिन्होंने सृष्टि रची है, सूर्य-चन्द्र, मनुष्य, जीव-जन्तु बनाए हैं, जीव-जन्तुओं के भोजन के उपाय सोचे हैं, उनका पालन करने के लिए माता-पिता बनाए हैं, माता-पिता में स्नेह का संचार किया है-वे समझाएँगे । इतने उपाय तो उन्होंने किए और यह उपाय वे न करेंगे?
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अगर समझाने की जरूरत होगी तो वे समझाएँगे, क्योंकि वे अन्तर्यामी हैं । यदि मिट्टी की मूर्ति पूजने में कोई भूल होगी तो क्या वे नहीं जानते कि पूजा उन्हीं की हो रही है? वे उसी पूजा से संतुष्ट होते हैं । इसके लिए तुम्हारा सिर क्यों धमक रहा है? तुम यह चेष्टा करो जिससे तुम्हें ज्ञान हो-भक्ति हो ।
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अब शायद मास्टर का अहंकार बिलकुल चूर्ण हो गया ।
वे सोचने लगे, ‘ये जो कह रहे हैं वह ठीक ही तो है । मुझे दूसरों को समझाने की क्या जरूरत? क्या मैंने ईश्वर को जान लिया है, या मुझमें उनके प्रति विशुद्ध भक्ति उत्पन्न हुई है? स्वयं के सोने के लिए जगह नहीं है, और लोगों को न्यौता दे रहे हैं !
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स्वयं को कुछ ज्ञान नहीं, अनुभव नहीं, और दूसरों को समझाने चले हैं ! वास्तव में कितनी लज्जा की बात है, कितनी हीन बुद्धि का काम है । क्या यह गणित, इतिहास या साहित्य है कि दूसरों को समझा दे? यह ईश्वरीय ज्ञान है । ये जो बातें कह रहे हैं, वे कैसे हृदय को स्पर्श कर रही है !
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श्रीरामकृष्ण के साथ मास्टर का यही प्रथम और यही अन्तिम तर्कवाद था ।
श्रीरामकृष्ण- तुम मिट्टी की मूर्ति की पूजा की बात कहते थे । यदि मिट्टी ही की हो तो भी उस पूजा की जरूरत है । देखो, सब प्रकार की पूजाओं की योजना ईश्वर ने ही की है । जिनका यह संसार है, उन्होंने ही यह सब किया है । जो जैसा अधिकारी है उसके लिए वैसा ही अनुष्ठान ईश्वर ने किया है । लड़के को जो भोजन रुचता है और जो उसे सह्य है, वही भोजन उसके लिए माँ पकाती है, समझे? मास्टर- जी हाँ ।
(क्रमशः)

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