गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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१९८ - साधु मिलाप मँगल । चौताल
आज हमारे राँमजी, साधु घर आये ।
मंगलाचार चहुँ दिशि भये, आनन्द बधाये ॥टेक॥
चौक पुराऊं मोतियाँ, घिस चन्दन लाऊं ।
पँच पदारथ पोइ के, यहु माल चढ़ाऊं ॥१॥
तन मन धन करूँ वारनैं, प्रदक्षिणा दीजे ।
शीश हमारा जीव ले, नौछावर कीजे ॥२॥
भाव भक्ति कर प्रीति सौं, प्रेम रस पीजे ।
सेवा वन्दन आरती, यहु लाहा लीजे ॥३॥
भाग हमारा हे सखी, सुख सागर पाया ।
दादू को दर्शन भया, मिले त्रिभुवन राया ॥४॥
सन्तों के दर्शन से होने वाले मँगल का परिचय दे रहे हैं - 
आज हमारे सन्तरूप रामजी घर पर पधारे हैं । इस कारण चतुष्टय अन्त:करण रूप चारों ही दिशाओं में तथा इन्द्रियादि में आनन्द की वृद्धि हुई है । 
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हम मोतियोँ से चौक पूरते हैं, चँदन घिसके लगाते हैं । अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष और प्रेम इन पाँचों पदार्थों वो पँच विषय - विरक्ति रूप पाँच पदार्थों की माला बनाकर सँतों के चढ़ाते हैं । 
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तन, मन, धन, निछावर करके प्रदक्षिणा देते हैं तथा हमारा शिर और जीव भी लीजिये, हम आप पर निछावर करते हैं । 
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हम भाव और प्रेमाभक्ति से प्रेम - रस का पान करते हुये सेवा, वन्दना और आरती करना रूप यह महान् लाभ ले रहे हैं । 
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हे सँत सखि ! हमारा महान् भाग्य था जिससे सुख - सागर सँत प्राप्त हुये हैं । हम को इन सँतों का दर्शन हुआ है तब से ऐसा ज्ञात होता है कि - मानो त्रिभुवन के राजा परब्रह्म ही मिल गये हैं । 
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नरेना में पूर्वकाल के सँतों ने दर्शन दिया था, तब यह पद तथा साधु अँग की १२१ वीं साखी कही थी । प्रसंग कथा दृ - सु - सि - त - ११ - १७ में देखो।
(क्रमशः)

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