मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

*२. स्मरण का अंग ~ ९/१२*

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*

*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ ९/१२*
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रोम रोम सौ सौ रतन, रसन रसन भिन्न नांम ।
कहि जगजीवन हेत स्यौं, ऐसा हरि जन रांम ॥९॥
संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि हर रोम में सो सो विधि से प्रभु में रत हो कर जिह्वा द्वारा उस प्रभु के भिन्न भिन्न नामों का प्रेम से भजन करने वाले ही प्रभु के जन या भक्त हैं ।
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रोम रोम कै लख पदम३, रसनां४ अगणित अपार ।
कहि जगजीवन रांमजी, (तउ) तुम गुण अगम अपार ॥१०॥
संत कहते हैं कि हे ईश्वर हर रोम के लाख, करोड़, पदम, नील या इससे भी अधिक संख्या वाले मुंह हो, तो भी हे प्रभु आपके अनन्त गुणों का वर्णन करना संभव न होगा ।
(३. लख पदम-लक्ष एवं पद्म = ये दोनों शब्द एक विशिष्ट संख्या के बोधक हैं । जैसे ‘लक्ष’ कहते-हैं सौ हजार को। तथा ‘पद्म’ कहते हैं-सौ नील को) (४. रसनां-जिह्वा)
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नैन श्रवन मुख नासिका, रसना गावै नांम ।
रोम रोम हरि हरि करै, जगजीवन सब ठांम ॥११॥
संत कहते हैं, हे प्रभु, इस दीन पर कृपा करें कि नयन, कान, मुख, नासिका व जिह्वा सभी नाम स्मरण करे, रोम रोम से हरि हरि हरि की ध्वनि प्रकट हो, हर स्थान पर प्रभु का आभास हो ।
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रांम रांम कहिता हृदै, रांमहि मांहि समाइ ।
कहि जगजीवन तहां, आनंद अंग न माइ ॥१२॥
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि राम राम कहते वे राम हृदय में ही समा जाते हैं । वहां अंग अंग में उनकी अलौकिक अनुभूति से अपार हर्ष होता है।
(क्रमशः)

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