सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

*विश्वास*

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*दादू एक बेसास बिन, जियरा डावांडोल ।* 
*निकट निधि दुःख पाइये, चिंतामणि अमोल ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ विश्वास का अंग)* 
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}* 
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ 
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । 
असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ (गीता, १०/३) 
उपाय- *विश्वास* 
एक भक्त- महाराज, इस प्रकार के संसारी जीवों के लिए क्या कोई उपाय नहीं है? 
श्रीरामकृष्ण- “उपाय अवश्य है । कभी कभी साधुओं का संग करना चाहिए 
और कभी कभी निर्जन स्थान में ईश्वर का स्मरण और विचार । परमात्मा से 
भक्ति और विश्वास की प्रार्थना करनी चाहिए । विश्वास हुआ कि सफलता मिली । विश्वास से बढ़कर और कुछ नहीं है ।” 
“(केदार के प्रति) विश्वास में कितना बल है, यह तो तुमने सुना है न? पुराणों में लिखा है कि रामचन्द्र को, जो साक्षात् पूर्णब्रह्म नारायण हैं, लंका जाने ले लिए सेतु बाँधना पड़ा था, परन्तु हनुमान रामनाम के विश्वास ही से कूदकर समुद्र के पार चले गए, उन्होंने सेतु की परवाह नहीं की ।” (सब हँसते हैं) 
“किसी को समुद्र के पार जाना था । विभीषण ने एक पत्ते पर रामनाम लिखकर उसके कपड़े के खूँटे में बाँधकर कहा कि तुम्हें अब कोई भय नहीं, विश्वास करके पानी के ऊपर से चले जाओ, किन्तु यदि तुम्हें अविश्वास हुआ तो तुम डूब जाओगे । वह मनुष्य बड़े मजे में समुद्र के ऊपर से चला जा रहा था । उसी समय उसकी यह इच्छा हुई कि गाँठ को खोलकर देखूँ तो इसमें क्या बँधा है । गाँठ खोलकर उसने देखा तो एक पत्ते पर रामनाम लिखा था । ज्योंही उसने सोचा कि अरे इसमें तो सिर्फ रामनाम लिखा है- अविश्वास हुआ कि वह डूब गया ।” 
“जिसका ईश्वर पर विश्वास है, वह यदि महापातक करे-गो-ब्राह्मण-स्त्री हत्या भी करे- तो भी इस विश्वास के बल से वह बड़े बड़े पापों से मुक्त हो सकता है । वह यदि कहें कि ऐसा काम कभी न करूँगा तो उसे फिर किसी बात का भय नहीं ।” यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने इस मर्म का बँगला गीत गया- 
“दुर्गा दुर्गा अगर जपूँ मैं, जब मेरे निकलेंगे प्राण । 
देखूँ कैसे नहीं तारती, कैसे हो करुणा की खान ॥ 
गो-ब्राह्मण की हत्या करके, करके भी मदिरा का पान । 
जरा नहीं परवा पापों की, लूँगा निश्चय पद निर्वाण ॥” 
(क्रमशः)

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