🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पूरक पूरा पास है, नाहीं दूर, गँवार ।*
*सब जानत हैं, बावरे ! देबे को हुसियार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विश्वास का अंग)*
====================
साभार ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
.
*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु,* *शान्ति*
####################
बुरहानपुर की बात है । गदाधरजी के पास जो भी आता उसे उसी दिन खर्च कर देते थे, कुछ भी पास नहीं रखते थे । किन्तु दासों(सेवकों) को वैराग्य न होने से वे इस विचार से कि न मालूम कल किस समय तक आवे, कुछ सामग्री छिपाकर रख लेते थे । एक दिन रात्रि में साधु आ गये । उनके भोजन के वास्ते सामग्री की आवश्यक्ता पड़ी । सेवकों ने कहा - "कल के लिये भगवत् भोग के लिये कुछ सामग्री रख ली गई थी, सो धरी है ।" गदाधर - "उसी से साधुओं को भोजन कराओ । भगवान के लिये प्रात: और आ जायेगी ।" सेवकों ने वैसा ही किया ।
दूसरे दिन तीसरे पहर तक कुछ भी नहीं आया । तब गदाधरजी के शिष्य तथा सेवक बड़े अशान्त होकर परस्पर कहने लगे कि - "देखो अत्यन्त खर्च के कारण अब तक सब लोग भूखे हैं । न जाने ईश्वर गदाधरजी के हाथ से कब छुड़ायेगा ।" उसी समय एक साहुकार आया । और गदाधरजी को दो-सौ रुपये भेंट किये । तब गदाधरजी ने कहा - "ये रुपये इन वैराग्य रहित असन्तोषियों के शिर मारो, ये कब के हाय-हाय कर रहे हैं।" इससे ज्ञात होता है कि बिना वैराग्य हृदय में शान्ति नहीं आती ।
बिन विराग आती नहीं, शांति हृदय के माहिं ।
दास गदाधर के सभी, शांत रह सके नाहिं ॥३६६॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^^

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें