रविवार, 23 फ़रवरी 2020

*भिन्न भिन्न स्वभाव*

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*ऐसा कोई एक मन, मरै सो जीवै नाहिं ।* 
*दादू ऐसे बहुत हैं, फिर आवै कलि माहिं ॥* 
*देखा देखी सब चले, पार न पहुँच्या जाइ ।* 
*दादू आसन पहल के, फिर फिर बैठे आइ ॥* 
*(श्री दादूवाणी ~ मन का अंग)* 
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}* 
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ 
*भिन्न भिन्न स्वभाव । क्या सब आदमी बराबर हैं?* 
श्रीरामकृष्ण-परमात्मा की सृष्टि में नाना प्रकार के जीवजन्तु और पेड़-पौधे हैं । पशुओं में अच्छे हैं और बुरे भी । उनमें बाघ जैसा हिंस्त्र प्राणी भी है । पेड़ों में अमृत जैसे फल लगें ऐसे भी पेड़ हैं और विष जैसे फल हों ऐसे भी हैं । इसी प्रकार मनुष्यों में भी भले-बुरे और साधु-असाधु हैं । उनमें संसारी जीव भी हैं और भक्त भी । 
*“जीव चार प्रकार के होते हैं। बद्ध, मुमुक्षु, मुक्त और नित्य।* 
*“नारदादि नित्यजीव हैं।* ऐसे जीव औरों के हित के लिए उन्हें शिक्षा देने के लिए संसार में रहते हैं । 
“बद्ध जीव विषय में फँसा रहता है । वह ईश्वर को भूल जाता है, भगवच्चिन्तन वह कभी नहीं करता । 
*“मुमुक्षु जीव वह है जो मुक्ति की इच्छा रखता है । मुमुक्षुओं में से कोई कोई मुक्त हो जाते हैं, कोई कोई नहीं हो सकते ।* 
*“मुक्त जीव संसार के कामिनी-कांचन में नहीं फँसते, जैसे साधु-महात्मा ।* इनके मन में विषय-बुद्धि नहीं रहती । ये सदा ईश्वर के ही पादपद्मों की चिन्ता करते हैं । 
“जब जाल तालाब में फेंका जाता है, तब जो दो-चार होशियार मछलियाँ होती हैं, वे जाल में नहीं आतीं । यह नित्य जीवों की उपमा है । किन्तु अनेक मछलियाँ जाल में फँस जाती हैं । इनमें से कुछ निकल भागने की भी चेष्टा करती हैं । यह मुमुक्षुओं की उपमा है । परन्तु सब मछलियाँ नहीं भाग सकतीं । केवल दो चार उछल-उछलकर जाल से बाहर हो जाती हैं । तब मछुआ कहता है, अरे एक बड़ी मछली बह गयी । किन्तु जो जाल में पड़ी हैं, उनमें से अधिकांश मछलियाँ निकल नहीं सकतीं । वे भागने की चेष्टा भी नहीं करतीं, जाल को मुँह में फाँसकर मिट्टी के नीचे सिर घुसेड़कर चुपचाप पड़ी रहती हैं और सोचती हैं, अब कोई भय की बात नहीं, बड़े आनन्द में हैं । पर वे नहीं जानतीं कि मछुआ घसीटकर उन्हें ले जाएगा । यह बद्ध जीवों की उपमा है । 
*संसारी मनुष्य-बद्ध जीव* 
*“बद्ध जीव संसार के कामिनी-कांचन में फँसे हैं।* उनके हाथ पैर बँधे हैं; किन्तु फिर भी वे सोचते हैं कि संसार में कामिनी-कांचन में ही सुख है और यहाँ हम निर्भय हैं । वे नहीं जानते, इन्हीं में उनकी मृत्यु होगी । बद्ध जीव जब मरता है, तब उसकी स्त्री कहती है, तुम तो चले, पर मेरे लिए क्या कर गए?’ माया भी ऐसी होती है कि बद्ध जीव पड़ा तो है मृत्युशय्या पर, पर चिराग में ज्यादा बत्ती जलती हुई देखकर कहता है, ‘तेल बहुत जल रहा है, बत्ती कम करो !’ 
“बद्ध जीव ईश्वर का स्मरण नहीं करता । यदि अवकाश मिला तो या तो गप करता है या फालतू काम करता है । पूछने पर कहता है, ‘क्या करूँ, चुपचाप बैठ नहीं सकता, इसी से घेरा बाँध रहा हूँ ।’ कभी ताश ही खेलकर समय काटता है ।” (सब स्तब्ध होकर सुन रहे हैं ।)
(क्रमशः)

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