मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

*२२. विद्याव्यासंगी निमाई*

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*दादू राम रसायन भर धर्या, साधुन शब्द मंझार ।*
*कोई पारखि पीवै प्रीति सौं, समझै शब्द विचार ॥*
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*२२. विद्याव्यासंगी निमाई*
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अन्या जगद्धितमयी मनसः प्रवृत्ति-
रन्यैव कापि रचना वचनावलीनाम्।
लोकोत्तरा च कृतिराकृतिरंगहृद्या
विद्यावतां सकलमेव गिरां दवीयः॥[१]
([१] विद्वानों की मनोवृत्ति जगत का हित करने वाली और संसारी लोगों की वृत्ति से विलक्षण ही होती है। उनकी वचनावली की रचना भी कुछ अलौकिक ही होती है। आकृति मनोहर और कृति लोकोत्तर होती है। उनकी सभी बातें ऐसी होती हैं जिनका वाणी के द्वारा वर्णन किया ही नहीं जा सकता। सु. र. भां. ४०/२५)
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प्रायः मेधावी बालक गम्भीर होते हैं। उनके गाम्भीर्य में उनका पाण्डित्य प्रस्फुटित नहीं होता, वे लोगों के सम्मान-भाजन तो अवश्य बन जाते हैं, किन्तु सभी साथी उनसे खुलकर बातें नहीं कर सकते। उनके साथ संलाप करने में कुछ संकोच और भय-सा हुआ करता है। यदि प्रखर बुद्धिवाला छात्र मेधावी होने के साथ ही चंचल, हँसमुख और मिलनसार भी हो तब तो उसका कहना ही क्या? सुहागा मिले सोने में मानो सुगन्ध भी विद्यमान है। ऐसा छात्र छोटे-बड़े सभी छात्रों तथा अध्यापकों का प्रीति-भाजन बन जाता है।
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निमाई ऐसे ही विद्यार्थी थे। ये आवश्यकता से अधिक चंचल थे ओर वैसे ही अद्वितीय मेधावी। हँसी का तो मानो मुख से सदा फुव्वारा ही छूटता रहता। ये बात-बात पर खूब जोरों से खिलखिलाकर हँसते और दूसरों को भी अपने मनोहर विनोदों से हँसाते रहते। इनके पास मुँह लटकाये कोई बैठ ही नहीं सकता था, ये रोते को हँसाने वाले थे।
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पं. गंगादास जी की पाठशाला में बहुत बडे़-बड़े विद्यार्थी अध्ययन करते थे, जो इनसे विद्यावृद्ध होने के साथ ही वयोवृद्ध भी थे। ३०/३०, ४०/४० वर्ष के छात्र पाठशाला में थे। इनकी अवस्था अभी १३/१४ ही वर्ष की थी, फिर भी ये बड़े छात्रों से सदा छेड़खानी करते रहते। उन छात्रों में बहुत-से तो बड़े ही मेधावी और प्रत्युत्पन्नमति थे, जो आगे चलकर लोक-प्रसिद्ध पण्डित हुए।
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प्रसिद्ध कवि मुरारी गुप्त, कमलाकान्त, तन्त्र शास्त्र के सर्वमान्य आचार्य कृष्णानन्द उन दिनों उसी पाठशाला में पढ़ते थे। निमाई छोटे-बड़े किसी से भी संकोच नहीं करते थे, ये सभी से भिड़ जाते और उनसे वाद-विवाद करने लगते। विशेषकर ये वैष्णव-विद्यार्थियों को खूब चिढ़ाया करते थे। उनकी भाँति-भाँति से मीठी-मीठी चुटकियाँ लेते और उन्हें लज्जित करके ही छोड़ते थे।
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मुरारी गुप्त इनसे अवस्था में बड़े थे, किन्तु ये उन्हें सदा चिढ़ाया करते। मुरारी पहले तो बालक समझकर सदा इनकी उपेक्षा करते रहते। जब उन्हें इनकी विलक्षण बुद्धि का परिचय प्राप्त हुआ, तब तो वे इनके साथ खूब बातें करने लगे। ये कहते- ‘मुरारी ! अमुक प्रयोग को सिद्ध करो।’ मुरारी उसे ठीक-ठीक सिद्ध करते। ये उसमें बीसों दोष निकालते, उसका कई प्रकार से खण्डन करते।
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मुरारी इनकी तर्कशैली को सुनकर आश्चर्य प्रकट करने लगते, तब आप एक-एक शंका का समाधान करते हुए मुरारी के ही मत को स्थापित करते। फिर हँसकर कहते- ‘गुप्त महाशय ! यह तो पण्डितों का काम है, आप ठहरे वैद्यराज ! जड़ी-बूटी घोंट-पीसकर गोली बनाना सीख ली ! नाड़ी देख ली, फिर चाहे रोगी मरे या जीये, तुम्हें अपने टके से काम।
*‘वैद्यराज नमस्तुभ्यं यमराजसहोदर।*
*यमस्तु हरते प्राणान् त्वं तु प्राणान् धनानि च॥’*
तुम तो यमराज के सहोदर हो। तुम्हें नमस्कार है।’
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मुरारी इनकी ये बातें सुनते और मन-ही-मन लज्जित होते, ऊपर से इनके साथ हँसने लगते, इस प्रकार ये मुरारी के साथ सदा ही विनोद करते रहते। कभी-कभी मुरारी अत्यन्त चिढ़ाने से खिन्न भी हो जाते, तब ये अपना कोमल कर कमल उनकी देह पर फेरने लगते। इनके स्पर्शमात्र से ही वे सब बातें भूल जाते और इनके प्रति अत्यन्त स्नेह प्रकट करने लगते।
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मुरारी से इनकी खूब पटती थी और मुरारी भी इनसे हार्दिक स्नेह करते थे। वाद-विवाद करने में ये अद्वितीय थे। जो भी छात्र मिल जाता उसी से भिड़ पड़ते और वह चाहे उल्टा कहे या सीधा, सभी का खण्डन करते और उसे परास्त करके ही छोड़ते। अपने-आप ही पहले किसी विषय का खण्डन कर देते, फिर युक्तियों द्वारा स्वयं ही उसका मण्डन भी करने लगते।
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विद्यार्थी इनकी ऐसी विलक्षण बुद्धि की बारम्बार बड़ाई करते और इनकी वाक्पटुता की भूरि-भूरि प्रशंसा करते। किसी भी पाठशाला के छात्र को गंगा तट पर या कहीं अन्यत्र रास्ते में पाते वहीं उसे पकड़ लेते और उससे संस्कृत में पूछते- ‘तुम्हारे गुरु का क्या नाम है? क्या पढ़ते हो?’ जब वह कहता अमुक पाठशाला में व्याकरण पढ़ता हूँ, तब झट आप उससे प्रयोग पूछने लगते। बेचारा विद्यार्थी इनसे जिस किसी भाँति अपना पीछा छुड़ाकर भागता।
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शाम के समय सभी पाठशालाओं के छात्र दल बना-बनाकर गंगा जी के किनारे आते और परस्पर में शास्त्रालाप किया करते। ये उन सबमें प्रधान रहते। कभी किसी पाठशाला के छात्रों के साथ शास्त्रार्थ कर रहे हैं, कभी किसी पाठशाला के छात्रों को परास्त कर रहे हैं, यही इनका नित्यप्रति का कार्य था।
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दस-दस, बीस-बीस छात्र मिलकर इनसे शंका करने लगते। ये बारी-बारी से सबका उत्तर देते। इनकी पाठशाला वाले इनका पक्ष लेते। कभी-कभी बातों-ही-बातों में वितण्डा भी होने लगता और मार-पीट तक की नौबत आ जाती। इस बात में भी ये किसी से कम नहीं थे। इस प्रकार ये सभी पाठशालाओं के छात्रों में प्रसिद्ध हो गये। विद्यार्थी इनकी सूरत से घबड़ाते थे।
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उन दिनों आजकल की भाँति व्याकरण के टीकाग्रन्थों का प्रचार नहीं था, छापेखाने नहीं थे, इसलिये पुस्तकें हाथ से ही लिखनी पड़ती थीं और मूल के साथ ही टीका को भी कण्ठस्थ करना पड़ता था। अध्यापक टीकाओं के ऊपर जो टिप्पणियाँ बताते उन्हें छात्र भूल जाते थे।
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इसलिये कई छात्र परस्पर मिलकर पाठ को विचार न लें तब तक पाठ लगता ही नहीं था। अब भी पाठशालाओं में बुद्धिमान छात्र अपने साथियों को पाठ विचरवया करते हैं। निमाई भी अपने साथियों को पाठ विचरवाते, इसलिये सभी छात्र इनका गुरु की भाँति आदर करते थे। ये विषय को इस ढंग से समझाते थे कि मूर्ख-से-मूर्ख भी छात्र सहज ही में पढे़ हुए पाठ को समझ जाता था।
(क्रमशः)

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