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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ १७/२०*
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रांम नांम जिन बीसरे, रांम नांम सुख सार ।
जगजीवन सब अंग मंहि, रांम नांम तत सार ॥१७॥
संत कहते हैं कि राम नाम को हम कभी भूले नहीं, क्योंकि सुख का सार राम नाम ही है । इससे ही सुख मिलता है सब जीवों के प्रत्येक अंग में रोम रोम में यही तत्व रुप है अतः राम नाम का ही आधार रखें ऐसा संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं ।
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रांम नांम सौं पोषिये, सब काहू का जीव ।
जगजीवन तो परसिये, परम सनेही पीव ॥१८॥
संत कहते हैं इस राम नाम रुपी संजीवनी से ही सभी का जीव पोषित होता है । जब ऐसी स्थिति आती है तभी वह जीव प्रभु सानिध्य का अनुभव पाता है ऐसा संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं ।
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रांम कहै सोई बड़ा, कुल तारण सपूत ।
जगजीवन हरि नां भजै, सो माथै मार कपूत५ ॥१९॥
संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि वह पुत्र ही किल को तारने वाला सच्चा लायक सुपुत्र है जो ईश्वर का भजन करता है । जो भजन नहीं करता व तो कुपुत्र है ऐसै कुपुत्र धिक्कार के पात्र होते हैं । (५. माथै मार कपूत-ऐसे कपूत को धिक्कार है जो हरि भजन नहीं करता)
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घटि सेझा६ ब्रह्म ग्यान का, वांणी विमल विलास ।
चात्रिग ज्यूं पिव पिव करै, तहँ जगजीवनदास ॥२०॥
संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि हम सब के हृदय में ब्रह्म ज्ञान का स्त्रोत बह रहा है, और उसी से सुन्दर दिव्य वाणी(अनहद) का गुंजन हो रहा है । जैसे चातक पक्षी निरतंर पीव पीव रटता है वैसे ही जीव निरतंर अजपा जाप करता है, भगवन्नाम स्मरण करता रहता है वहीं आनंद रुप में प्रभु रहते हैं । ऐसा संत कहते हैं । (६. घटी सेझा-शरीर में प्राकृतिक जलस्त्रोत)
(क्रमशः)

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