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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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१९१ - साच झूठ निर्णय । प्रतिताल
साँई को साच पियारा,
साचै साच सुहावै देखो, सांचा सिरजनहारा ॥टेक॥
ज्यों घण घावां१ सार घड़ीजे, झूठ सबै झड़ जाई ।
घण के घाऊं सार रहेगा, झूठ न माँहिं समाई ॥१॥
कनक कसौटी अग्नि मुख दीजे, पँक२ सबै जल जाई ।
यों तो कसणी साच सहेगा, झूठ सहै नहिं भाई ॥२॥
ज्यों घृत को ले ताता कीजे, ताइ ताइ तत कीन्हा ।
तत्वैं तत्व रहेगा भाई, झूठ सबै जल खीना ॥३॥
यों तो कसणी साच सहेगा, साचा कस कस लेवै ।
दादू दर्शन साचा पावे, झूठे दरस न देवै ॥४॥
सत्य झूठ का निर्णय दिखा रहे हैं - देखो भाई ! सच्चे को सत्य ही अच्छा लगता है । सृष्टि कर्ता परमात्मा सत्य है, अत: उन प्रभु को सत्य ही प्रिय है ।
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जैसे घन की चोट१ मार - मार कर लोहे का कुछ बनाते हैं, तब उसका काट अलग हो जाता है और लोहा रह जाता है, वैसे ही सद्गुरु - घन के शब्दाघातों से सत्य रूप सार ही रहेगा । मिथ्या उसमें न समाकर अलग हो जायगा ।
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सुवर्ण की परीक्षा करने पर सदोष हो तो अग्नि देते हैं, तब उसका सब मैल २ जल जाता है वैसे ही ऐसी कठौर परीक्षा सच्चा ही सह सकता है, झूठा नहीं सह सकता, वह तो नष्ट ही हो जाता है ।
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जैसे घृत को उष्ण कर, उसके फूल आदि को निकाल के सार रूप घृत रख लेते हैं, वैसे ही अन्त:करण के सब दोष निकाल देने पर निर्दोष आत्म - तत्व ब्रह्म - तत्व में मिल कर रहेगा । सँपूर्ण मिथ्या मायिक प्रपँच की सभी भावना क्षीण होकर ज्ञान द्वारा कर्म राशि जल जायगी
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किन्तु इस प्रकार की कठौर परीक्षा सच्चा साधक ही सह सकेगा और सच्चा सद्गुरु ही परीक्षा करके उसके दोषों को दूर करेगा । इस प्रकार निर्मल और सच्चा साधक ही परमात्मा का दर्शन प्राप्त करेगा । झूठे को वे सत्य प्रभु अपना दर्शन नहीं देते ।
(क्रमशः)

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