🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*तब हम एक भये रे भाई,*
*मोहन मिलि सांची मति आई ॥टेक॥*
*पारस परस भये सुखदाई,*
*तब दुतिया, दुर्मति दूर गँवाई ॥१॥*
*मलियागिरि मरम मिल पाया,*
*तब वंश वरण कुल भ्रम गँवाया ॥२॥*
*हरि जल नीर निकट जब आया,*
*तब बूँद बूँद मिल सहज समाया ॥३॥*
*नाना भेद भ्रम सब भागा,*
*तब दादू एक रंगै रंग लागा ॥४॥*
===================
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
.
*सुमति कुमति का अंग १०४*
.
अग्नि अज्ञानी देखिये, ज्ञानी शीतल नीर ।
रज्जब दोन्यों ठौर का, ब्योरा१ पाया वीर२ ॥१७॥
अज्ञानी अग्नि के समान तप्त और ज्ञानी जल के समान शीतल देखा जाता है । हे भाई२ ! अज्ञानी और ज्ञानी रूप दोनों स्थानों का विवरण१ हमने उक्त प्रकार से प्राप्त किया है ।
.
दुर्मति दारू१ सौं भरे, वपु सु बाण विधि माँहिं ।
रज्जब त्रिगुणी जरे२ बिन, निश्चल उभय सु नाँहि ॥१८॥
जैसे अग्नि बाण में बारूद१ भरी जाती है, वैसे ही शरीर में दुर्बुद्धि भरी है, बारूद और त्रिगुणात्मिका दुर्बुद्धि जले२ बिना बाण और शरीर दोनों ही निश्चल नहीं होते ।
.
कठिन कुमति की गांठ है, दई१ मुग्ध२ मन घोल३ ।
जन रज्जब सो सुमति बिन, कोई सके न खोल ॥१९॥
सुमति रूप ग्रंथी बड़ी कठिन है, मूर्ख२ मन ने खूब खेंचकर३ लगादी१ है, उसको सुमति बिना कोई भी नहीं खोल सकता ।
.
मूंज जेवड़ा मुग्ध मति, गांठ गर्व की देय ।
जन रज्जब खोलन मतै१, तामस तोयं भेय ॥२०॥
किसी ने मूंज की रस्सी की गांठ खूब खेंचकर लगा दी और खोलने का विचार१ किया तब उसे जल से भिगो दिया । ऐसा करने से खुलना कठिन होता है, वैसे ही मूर्ख प्राणी ने गर्व की गांठ लगा दी है और उसे खोलने का विचार किया तब तमोगुण बढाया है, ऐसा करने से गर्व दूर होना अति कठिन है ।
.
कूवे कच्छप कोल घरि, त्यों कुमति सु काया माँहिं ।
जन रज्जब तीन्यों ढहै, कबहूं उबरै नाँहिं ॥२१॥
कूप में कछुआ और घर में सूअर रहता है, वैसे ही शरीर में कुमति रहती है; कूप, घर और शरीर तीनों नष्ट होंगे तब कछुआ, सुवर और कुमति भी कभी नहीं बच सकेंगे ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित सुमति कुमति का अंग १०४ समाप्तः ॥सा. ३२५५॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें