मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020

*२. स्मरण का अंग ~ १३/१६*


🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ १३/१६*
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रांम रांम कहिता हृदै, रांम सरीषा होइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, परगट देखै सोइ ॥१३॥
संत कहते है राम राम हृदय से कहते रहने से यह मन भी राममय ही हो जाता है । संतजगजीवन जी कहते हैं कि वह स्थिति गुप्त नहीं रहती प्रकट होती है ।
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लै१ रूपी अस्थूल है, असत२ तुचा३ नहि जाइ ।
कहि जगजीवन रांम रत, रांमहि मांहि समाइ ॥१४॥
संत कहते हैं कि ईश्वर की लगन संसारिक वस्तुओं की भांति स्थूल नहीं है वह दिखती नहीं है, जिसे लगन लगी वही इसका अनुभव कर पाता है। जैसै अस्थि व त्वचा स्थूल है, हमें दिखती है, लय या लगन राम में रत होने से स्थूल नेत्रों से दिखती नहीं राम ही में समाहित होती है । (१. लै-लय = एकाग्रता) (२. असत-अस्थि = हड्डी) (३. तुचा-त्वक् = चर्म)
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जिस मुख मांहै रांमजी, रसानां पावन नांम ।
जगजीवन अति बीगसै४, सोइ बदन सब ठांम ॥१५॥
संत कहते है जिस मुख में रामजी हैं, रसना पवित्र राम नाम का उच्चारण करती है वह ही मुख विकसित होता है, प्रफुल्लित होता है, सदा आनंदित रहता है, ऐसा संतजगजीवन जी महाराज कहते हैं । (४. बीगसै-विकसित = प्रसन्न)
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रांम रांम कहि बोलिये, मुख तैं बांणी एह ।
जगजीवन निज भाषिये, तो सुख पावै देह ॥१६॥
संत कहते हैं कि राम राम कह कर ही बोले मुख से यही वाणी उच्चारें । संत जगजीवन जी कहते हैं यदि हम ऐसा कहेंगे तो ही यह देह सुख पायेगी ।
(क्रमशः)

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