बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

*समाधि में*

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*अविनाशी संग आत्मा, रमे हो रैण दिन राम ।*
*एक निरंतर ते भजे, हरि हरि प्राणी नाम ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद्यांश. २४८)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ 
(गीता, २।५३)
*समाधि में*
सभा भंग हुई । भक्त सब इधर-उधर घूमने लगे । मास्टर भी पंचवटी आदि स्थानों में घूम रहे थे । समय पाँच के लगभग होगा । कुछ देर बाद वे श्रीरामकृष्ण के कमरे में आए और देखा उसके उत्तर की ओर छोटे बरामदे में अद्भुत घटना हो रही है ।
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श्रीरामकृष्ण स्थिर भाव से खड़े हैं और नरेन्द्र गा रहे हैं । दो-चार भक्त भी खड़े हैं । मास्टर आकर गाना सुनने लगे । गाना सुनते हुए वे मुग्ध हो गए । श्रीरामकृष्ण के गाने को छोड़कर ऐसा मधुर गाना उन्होंने कभी कहीं नहीं सुना था । अकस्मात् श्रीरामकृष्ण की ओर देखकर वे स्तब्ध हो गए । श्रीरामकृष्ण की देह निःस्पन्द हो गयी थी और नेत्र निर्निमेष । 
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श्वासोच्छ्वास चल रहा था या नहीं-बताना कठिन है । पूछने पर एक भक्त ने कहा, यह ‘समाधि’ है । मास्टर ने ऐसा न कभी देखा था, न सुना था । वे विस्मित होकर सोचने लगे, भगवच्चिन्तन करते हुए मनुष्यों का बाह्यज्ञान क्या यहाँ तक चला जाता है? न जाने कितनी भक्ति और विश्वास हो तो मनुष्यों की यह अवस्था होती है !
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नरेन्द्र जो गीत गा रहे थे, उसका भाव यह है-
“ऐ मन, तू चिद्घन हरि का चिन्तन कर । उसकी मोहनमूर्ति की कैसी अनुपम छटा है, जो भक्तों का मन हर लेती है वह रूप नये नये वर्णों से मनोहर है, कोटि चन्द्रमाओं को लजानेवाला है, -उसकी छटा क्या है मानो बिजली चमकती है ! उसे देख आनन्द से जी भर जाता है ।”
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गीत के इस चरण को गाते समय श्रीरामकृष्ण चौंकने लगे । देह पुलकायमान हुई । आँखों से आनन्द के आँसू बहने लगे । बीच बीच में मानो कुछ देखकर मुस्कराते हैं । कोटि चन्द्रमाओं को लजानेवाली उस अनुपम रूप का वे अवश्य दर्शन करते होंगे । क्या यही ईश्वर-दर्शन है? कितनी साधना, कितनी तपस्या, कितनी भक्ति और विश्वास से ईश्वर का ऐसा दर्शन होता है? फिर गाना होने लगा ।
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(भावार्थ)-“हृदय-रूपी कमलासन पर उनके चरणों का भजन कर, शान्त मन और प्रेमभरे नेत्रों से उस अपूर्व मनोहर दृश्य को देख ले ।”
फिर वही जगत् को मोहनेवाली मुस्कराहट ! शरीर वैसा ही निश्चल हो गया । आँखें बन्द हो गयीं-मानो कुछ अलौकिक रूप देख रहे हैं, और देखकर आनन्द से भरपूर हो रहे हैं ।
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अब गीत समाप्त हुआ । नरेन्द्र ने गाया-
(भावार्थ)-“चिदानन्द-रस में-प्रेमानन्द रस में-परम भक्ति से चिरदिन के लिए मग्न हो जा ।”
समाधि और प्रेमानन्द की इस अद्भुत छबि को हृदय में रखते हुए मास्टर घर लौटने लगे । बीच बीच में दिल को मतवाला करनेवाली वह मधुर गीत याद आता रहा । 
(क्रमशः)

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