रविवार, 1 मार्च 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२०१ - चौताल
चलो मन म्हारा, जहां मिँत्र हमारा,
तहं जामण मरण नहिं जाणिये, 
नहिं जाणिये ॥टेक॥
मोह न माया मेरा न तेरा,
आवागमन नहीं जम फेरा ॥१॥
पिंड न पड़ै प्राण नहिं छूटै, 
काल न लागै आयु न खूटै ॥२॥
अमर लोक तहं अखिल शरीरा, 
व्याधि विकार न व्यापै पीरा ॥३॥
राम राज कोइ भिड़ै न भाजै, 
सुस्थिर रहणा बैठा छाजै ॥४॥
अलख निरंजन और न कोई, 
मिँत्र हमारा दादू सोई ॥५॥
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हे मेरे मन ! वहां चल, जहां हमारा मित्र प्रभु है । मैं तुझे बारम्बार कहता हूं - वहां जाने पर जन्म - मरणादि क्लेशों को तो कोई जानता भी नहीं । 
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वहां मोह - माया, मेरा - तेरा, आना - जाना, यम के द्वारा नरकों में फिराना आदि नहीं है, 
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शरीर नहीं गिरता, प्राण नहीं निकलते, काल का कुछ भी बल नहीं लगता, आयु समाप्त नहीं होती । 
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वह अमर लोक है, वहां पर सभी शरीरों को रोगादिक विकार जन्य पीड़ा नहीं होती । 
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उस निरंजन राम के राज्य में न तो कोई युद्ध करता है और न कोई भयभीत होकर दौड़ता है । वहां तो सम्यक् स्थिरता पूर्वक बैठे हुये ही शोभा देते हैं अर्थात् ब्रह्म - निष्ठा ही रहती है ।
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ऐसा अलख निरंजन राम का स्वरूप ही है, अन्य कोई देश विशेष नहीं है और हमारा परम मित्र भी वही है ।
(क्रमशः)

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