रविवार, 1 मार्च 2020

*माया का अंग १०७*(१७/२०)* =

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*दादू माया चेरी संत की, दासी उस दरबार ।*
*ठकुराणी सब जगत की, तीनों लोक मंझार ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
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*माया का अंग १०७*
चेरी के चेरे किये, चौरासी लख जंत । 
तो रज्जब कहि कौन है, शक्ति समान महंत ॥१७॥ 
ईश्वर चौरासी लाख जीवों ही अपनी दासी माया के दास बना दिया तब कहो माया के समान महंत कौन है । 
रज्जब शक्ति सुमेरु सम, चरण चकहु१ दृढ बास । 
सो ठाहर छोड़ै नहीं, छाया निश नर नाश ॥१८॥ 
माया सुमेरु के समान है, जैसे सुमेरु के पैर दृढता से बसते हैं, पृथ्वी१ को छोड़ते नहीं किन्तु सुमेरु की छाया तो रात्रि को नष्ट हो जाती है । वैसे ही माया नर के मन रूप स्थान को नहीं छोड़ती, उसमें दृढता से बसती है किन्तु माया की छाया कनकादि का तो अभाव दुर्भाग्य रूप रात्रि में देखा जाता है । 
भौन१ गदी परि होत है, चाकर मनिखा खानि । 
सो सब एक समान हैं, रज्जब फेर२ न जानि ॥१९॥ 
भुवन१ की गद्दी पर बैठने वाले सेठ और उनके नौकर मनुष्य खानि अर्थात मनुष्यता में तो वे एक जैसे ही हैं, उनमें कोई भेद२ नहीं है, जो भेद है वह माया का ही है, सेठों के पास माया है और नौकरों के पास नहीं है । 
माया मुख बोले नहीं, सदा लिये चुपचार । 
रज्जब बकते सब फिरैं, इस मौनणि की लार ॥२०॥ 
माया मुख से नहीं बोलती सदा मौन लिये चुप-चाप रहती है, इस मौननि के पिछे नाना प्रकार से बकवाद करते फिरते हैं । 
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित माया का अंग १०७ समाप्तः ॥सा. ३२९७॥ 
(क्रमशः)

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