रविवार, 1 मार्च 2020

*साधुसंग और प्रार्थना*

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*दादू घायल दरदवंद, अंतरि करै पुकार ।*
*सांई सुणै सब लोक में, दादू यह अधिकार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विरह का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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परिच्छेद
*शामपुकुर में प्राणकृष्ण के मकान पर श्रीरामकृष्ण* 
श्रीरामकृष्ण ने आज कलकत्ते में शुभागमन किया है । श्रीयुत प्राणकृष्ण मुखोपाध्याय के शामपुकुरवाले मकान के दुमँजले पर बैठक-घर में भक्तों के साथ बैठे हैं । अभी अभी भक्तों के साथ बैठकर प्रसाद पा चुके हैं । आज २ अप्रैल, रविवार १८८२ ई., चैत्र शुक्ला चतुर्दशी है । इस समय दिन के एक-दो बजे होंगे । कप्तान उसी मुहल्ले में रहते हैं ।
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श्रीरामकृष्ण की इच्छा है कि इस मकान में विश्राम करने के बाद कप्तान के घर होकर उनसे मिलकर, ‘कमलकुटीर’ नामक मकान में श्री केशव सेन को देखने जाएँ । प्राणकृष्ण बैठक-घर में बैठे हैं । राम, मनोहर, केदार, सुरेन्द्र, गिरीन्द्र(सुरेन्द्र के भाई), राखाल, बलराम, मास्टर आदि भक्तगण उपस्थित है ।
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मुहल्ले के कुछ सज्जन तथा अन्य दूसरे निमंत्रित व्यक्ति भी आए हैं । श्रीरामकृष्ण क्या कहते हैं-यह सुनने के लिए सभी उत्सुक होकर बैठे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “ईश्वर और उनका ऐश्वर्य । यह जगत उनका ऐश्वर्य है । परन्तु ऐश्वर्य देखकर ही सब लोग भूल जाते हैं, जिनका ऐश्वर्य है उनकी खोज नहीं करते । कामिनीकांचन का भोग मारने सभी जाते हैं । परन्तु उसमें दुःख और अशान्ति ही अधिक है । संसार मानो विशालाक्षी नदी का भँवर है । नाव भँवर में पड़ने पर फिर उसका बचना कठिन है । गुखरू काँटे की तरह एक छूटता है तो दूसरा जकड़ जाता है । गोरख धन्धे में एक बार घुसने पर निकलना कठिन है । मनुष्य मानो जल-सा जाता है ।” 
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एक भक्त- महाराज, तो उपाय?
*उपाय-साधुसंग और प्रार्थना* 
श्रीरामकृष्ण- उपाय-साधुसंग और प्रार्थना । वैद्य के पास गये बिना रोग ठीक नहीं होता । साधुसंग एक ही दिन करने से कुछ नहीं होता । सदा ही आवश्यक है । रोग लगा ही है । फिर वैद्य के पास बिना रहे नाड़ी ज्ञान नहीं होता । साथ साथ घूमना पड़ता है, तब समझ में आता है कि कौन कफ की नाड़ी है और कौन पित्त की नाड़ी ।
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भक्त-साधुसंग से क्या उपकार होता है ? 
श्रीरामकृष्ण- ईश्वर पर अनुराग होता है । उनसे प्रेम होता है । व्याकुलता न आने से कुछ भी नहीं होता है । साधुसंग करते करते ईश्वर के लिए प्राण व्याकुल होता है-जिस प्रकार घर में कोई अस्वस्थ होने पर मन सदा ही चिन्तित रहता है और यदि किसी की नौकरी छूट जाती है तो वह जिस प्रकार आफिस आफिस में घूमता रहता है, व्याकुल होता रहता है, उसी प्रकार । यदि किसी आफिस में उसे जवाब मिलता है कि कोई काम नहीं है तो फिर दूसरे दिन आकर पूछता है, ‘क्या आज कोई जगह खाली हुई है?’
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“एक और उपाय है- *व्याकुल होकर प्रार्थना करना ।* 
ईश्वर अपने हैं, उनसे कहना पड़ता है, ‘तुम कैसे हो, दर्शन दो-दर्शन देना ही होगा-तुमने मुझे पैदा क्यों किया? सिक्खों ने कहा था, ‘ईश्वर दयामय है ।’ मैंने उनसे कहा था, ‘दयामय क्यों कहूँ? उन्होंने हमें पैदा किया है, यदि वे ऐसा करें जिससे हमारा मंगल हो, तो इसमें आश्चर्य क्या है? माँ-बाप बच्चों का पालन करेंगे ही, इसमें फिर दया की क्या बात है? यह तो करना ही होगा ।’ 
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इसीलिए उन पर जबरदस्ती करके उनसे प्रार्थना स्वीकार करानी होगी । वे हमारी माँ, और हमारे बाप जो हैं । लड़का यदि खाना-पीना छोड़ दे तो माँ-बाप उसके बालिग होने के तीन वर्ष पहले ही उसका हिस्सा उसे दे देते हैं । फिर जब लड़का पैसे माँगता और बार बार कहता है, ‘माँ, तेरे पैरों पड़ता हूँ, मुझे दो पैसे दे दे’ तो माँ हैरान होकर उसकी व्याकुलता देख पैसा फेंक ही देती है ।
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“साधुसंग करने पर एक और उपकार होता है,-सत् और असत् का विचार । सत् नित्य पदार्थ अर्थात् ईश्वर, असत् अर्थात् अनित्य । असत् पथ पर मन जाते ही विचार करना पड़ता है । हाथी जब दूसरों के केले के पेड़ खाने के लिए सूँड बढ़ाता है तो उसी समय महावत उसे अंकुश मारता है ।”
(क्रमशः)

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