शुक्रवार, 6 मार्च 2020

*३५. श्रीगयाधाम की यात्रा*

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*मैं जु चरण चित चाहना,*
*तुम सेवक-सा धारना ॥*
*तेरे दिन प्रति चरण दिखावना,*
*कर दया अंतर आवना ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. २०)
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*३५. श्रीगयाधाम की यात्रा*
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यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥[१]
([१] श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, अन्य साधारण लोग उसी भाँति उसका अनुकरण करते हैं, जिस बात को वे प्रमाण मानते हैं उसे ही दूसरे लोग भी प्रामाणिक समझते हैं। गीता ३/२१)
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आश्विन शुक्ला दशमी का दिवस है। आज के ही दिन भगवान श्रीरामचन्द्रजी ने लंका पर विजय प्राप्त करने के लिये चढ़ाई की थी। घर-घर आनन्द मनाया जा रहा है। आज के ही दिन वर्षाकाल की परिसमाप्ति समझी जाती है। व्यापारी आज के ही दिन वाणिज्य के निमित्त विदेशों की यात्रा करते हैं।
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नृपतिगण आज के ही दिन दूसरे देशों को दिग्विजय करने के निमित्त अपनी-अपनी सेनाओं को सजाकर राज्य-सीमा से बाहर होते हैं। चार महीने एक ही स्थान पर रहने वाले परिव्राजक आज के ही दिन फिर से भ्रमण करना आरम्भ कर देते हैं। तीर्थयात्रा करने वाले भी आज के ही दिन यात्रा के लिये प्रस्थान करते हैं।
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अब के नवद्वीप से भी बहुत-से यात्री गयाधाम की यात्रा करने जा रहे थे। गौरांग के मौसा पं. चन्द्रशेखर भी गया को जाना चाहते थे, उन्होंने अपनी इच्छा निमाई को जतायी। सुनते ही इन्होंने बड़ी प्रसन्नता प्रकट की। माता की आज्ञा लेकर इन्होंने भी अपने कुछ स्नेही तथा छात्रों के साथ गया जी की यात्रा का निश्चय किया सब सामान जुटाकर अन्य लोगों को साथ लेकर ये गयाधाम के लिये चल पड़े।
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इस प्रकार ये अपने सभी साथियों के साथ आनन्द मनाते ओर प्रेम में श्रीकृष्ण-कीर्तन करते हुए मन्दार नामक स्थान में पहुँचे। इन स्थान में पहुँचकर इन्हें बड़े जोरों से ज्वर आ गया। इनके साथी इनकी ऐसी दशा देखकर बहुत अधिक चिन्तित हुए और भाँति-भाँति के उपचार करने लगे, किन्तु इन्हें किसी प्रकार भी लाभ नहीं हुआ। अन्त में इन्होंने अपनी ओषधि अपने-आप ही बतायी। इन्होंने कहा- ‘मेरी व्याधि इन प्राकृतिक ओषधियों से न जायगी।
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यह रोग तो असाध्य है, इसकी एकमात्र ओषधि है भगवत्कृपा ! भगवान की प्रसन्नता का सर्वश्रेष्ठ साधन है ब्राह्मणों की अर्चा-पूजा। श्रीमद्भागवत में भगवान ने अग्नि और ब्राह्मण अपने दो ही मुख बताये हैं, उनमें ब्राह्मण को ही सर्वोत्तम सुख बताया है। वे अपने श्रीमुख से ही सनकादि महर्षियों की स्तुति करते हुए कहते हैं-

नाहं तथाग्नि यजमानहविर्विताने
श्च्योतद्घृतप्लुतमदन् हुतभुड्मुखेन।
यद् ब्रह्मणस्य मुखतश्चरतोऽनुघासं
तुष्टस्य मय्यवहितैर्निजकर्मपाकैः॥
अर्थात भगवान कहते हैं ‘मेरे अग्नि और ब्राह्मण ये दो मुख हैं, इनमें ब्राह्मण ही मेरा श्रेष्ठ मुख है, जिन्होंने अपने सम्पूर्ण कर्मों को मेरे ही अर्पण कर दिया है और जो सदा सन्तुष्ट ही रहते हैं, ऐसा ब्राह्मण जो टपकते हुए घृत से व्याप्त सुस्वादु अन्न के व्यंजनों को खाता है, उसके प्रत्येक ग्रास के साथ मैं ही उस अन्न के रस का आस्वादन करता हूँ।
उस ब्राह्मण की तृप्ति से जितना मैं तुष्ट होता हूँ, उतना यज्ञ में अग्निद्वारा, यजमान के अर्पण किये हुए कवि आदि से नहीं होता।’ ‘जिन ब्राह्मणों की ऐसी महिमा साक्षात भगवान ने अपने श्रीमुख से वर्णन की है, उन्हीं का पादोदक पान करने से मेरा यह रोग शमन हो सकेगा।’
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यह सुनकर एक सरल- से विद्यार्थी ने प्रश्न किया- ‘गुरुजी ! जो ब्राह्मण नहीं हैं केवल ब्रह्मबन्धु हैं[१] ([१] अर्थात केवल नाममात्र के ही ब्राह्मण हैं, बस, जिन्होंने ब्राह्मण-वंश में जन्म ही भर ग्रहण किया है) उनका तो इतना सत्कार नहीं करना चाहिये। वे तो केवल काष्ठ की हस्ती के समान नाममात्र के ही ब्राह्मण हैं, जैसे काष्ठ के हाथी से हाथीपने का कोई भी काम नहीं चलने का, उसी प्रकार जो अपने धर्म-कर्म से हीन है, जिसने विद्या प्राप्त नहीं की, उस नाममात्र के ब्राह्मण का हम आदर क्यों करें?’
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निमाई पण्डित ने थोड़ी देर सोचने के अनन्तर कहा- ‘तुम्हारा कथन एक प्रकार से ठीक ही है, जो अपने धर्म-कर्म से रहित है, वह तो दूध न देने वाली वन्ध्या गौ के समान है, उससे संसारी स्वार्थ कोई सध नहीं सकता। फिर भी जो सभी कामों को सकाम भाव से नहीं करते हैं, जो श्रद्धा के साथ शास्त्रों की आज्ञानुसार अपने को ही सुधारने का सदा प्रयत्न करते रहते हैं, वे दूसरों के दोषों के प्रति उदासीन रहते हैं।
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हम दोषदृष्टि से देखना आरम्भ करेंगे तब तो संसार में एक भी मनुष्य दोष से रहित दृष्टिगोचर नहीं होगा। संसार ही दोष-गुण के सम्मिश्रण से बना है ! इसलिये अपनी बुद्धि को संकुचित बनाकर गौ की सेवा करने में यह बुद्धि रखना ठीक नहीं कि जो गौ अधिक दूध देगी हम उसी की सेवा करेंगे। जो दूध नहीं देती, उससे हमें क्या मतलब?
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ऐसी बुद्धि रखने से तो विचारों में संकुचितता आ जायगी। तुम तो शास्त्र की आज्ञा समझकर गौमात्र में श्रद्धा रखो। यह तो स्वाभाविक ही होगा कि जो गौ सुशील, सुन्दर तथा दुधारी होगी, उसकी सभी लोग इच्छा-अनिच्छापूर्वक सेवा-शुश्रूषा करेंगे और अश्रद्धालु पुरुषों को भी सुमिष्ट दूध के लालच से प्रभावान्वित होकर ऐसी गौ की सेवा करते हुए देखा गया है, किन्तु यह सर्वश्रेष्ठ पक्ष नहीं है।
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सर्वश्रेष्ठ तो यही है कि मन में किसी भी प्रकार का पक्षपात न करके केवल शास्त्राज्ञा समझकर और अपना कर्तव्य मानकर गो-ब्राह्मणमात्र की सेवा करें। किन्तु ऐसे श्रद्धालु संसार में बहुत ही थोडे़ होते हैं।
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भगवान ने स्वयं क्रुद्ध हुए भृगु को अपनी छाती में जोर से लात मारते देखकर बड़ी नम्रता से दुःख प्रकट करते हुए कहा था-
अतीव कोमलौ तात चरणौ ते महामुने।
अर्थात हे ब्राह्मणदेव ! आपके कोमल चरणारविन्दों को मेरी इस वज्र-सी छाती में लगने पर बड़ा कष्ट हुआ होगा।
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ये बहुत ऊँचे साधक के भाव हैं, जो संसारी मान-प्रतिष्ठा तथा धन और विषयभोगों की इच्छा को सर्वथा त्याग कर एकमात्र भगवत-कृपा को ही अपने जीवन का चरम लक्ष्य समझकर सभी कार्यों को करते हैं, उन्हीं के लिये भगवान अपने श्रीमुख से फिर स्वयं उपदेश करते हैं-
ये ब्राह्मणान्मयि धिया क्षिपतोऽर्चयन्त-
स्तुष्यद्धृदः स्मितसुधोक्षितपद्मवक्त्राः।
वाण्यानुरागकलयात्मजवद्गृणन्तः
सम्बोधयन्त्यहमिवाहमुपाहृतस्तैः॥
‘जो पुरुष वासुदेव-बुद्धि रखकर कठोर बोलने वाले ब्राह्मणों की भी प्रसन्न अन्तःकरण से कमल के समान प्रफुल्लित मुख द्वारा अपनी अमृतमयी वाणी से प्रसन्नचित्त होकर स्तुति करते हैं और पिता के क्रुद्ध होने पर जिस प्रकार पुत्रादि क्रुद्ध न होकर उनका सत्कार ही करते हैं, उसी प्रकार उन्हें प्रेमपूर्वक बुलाते हैं, तो समझ लो ऐसे पुरुषों ने मुझे अपने वश में ही कर लिया है।’
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क्रुद्ध होने वाले किसी भी प्राणी पर जो क्रोध नहीं करता वही सच्चा साधक और परमार्थी है। प्रभु के पाद-पद्मों की प्राप्ति ही जिसका एकमात्र लक्ष्य है, उसके हृदय में दूसरों के प्रति असम्मान के भाव आ ही नहीं सकते। इसलिये तुम लोग शीघ्र जाकर इस ग्राम के किसी ब्राह्मण का पादोदक लाकर मेरे मुख में डाल दो।’
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इनकी आज्ञा पाकर दो-तीन विद्यार्थी गये और एक परम शुद्ध वैष्णव ब्राह्मण के चरणों को धोकर उसका चरणोदक ले आये। यह तो इनकी लोगों को ब्राह्मणों का महत्त्व प्रदर्शित करने की लीला थी। चरणोदक का पान करते ही ये झट से अच्छे हो गये और अपने सभी साथियों के साथ आगे बढ़ने लगे।
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पुनपुना-तीर्थ में पहुँचकर इन सब लोगों ने पुनपुन नाम की नदी में स्नान किया और सभी ने अपने-अपने पितरों का श्राद्धादि कराया। इसके अनन्तर सभी श्रीगयाधाम में पहुँच गये। ब्रह्मकुण्ड में स्नान और देव-पितृ-श्राद्धादि करके निमाई पण्डित अपने साथियों के सहित चक्रवेड़ा के भीतर विष्णु-पाद-पद्मों के दर्शनों के निमित्त गये। ब्राह्मणों ने पाद-पद्मों पर माला-पुष्प चढ़ाने को कहा। ये अपने विद्यार्थियों के द्वारा गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, माला आदि सभी पूजन की बहुत-सी सामग्री साथ लिवाते गये थे।
(क्रमशः)

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