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*संतों ! राम बाण मोहि लागे ।*
*मारत मृग मर्म तब पायो,*
*सब संगी मिल जागे ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. २०३)
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साभार ~ Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*३५. श्रीगयाधाम की यात्रा*
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गयाधाम के तीर्थ-पण्डा जोरों से पाद-पद्मों का प्रभाव वर्णन कर रहे थे। वे उच्च स्वर से कह रहे थे- ‘इन्हीं पाद-पद्मों के धोवन से जगत-पावनी मुनि-मन-हारिणी भगवती भागीरथी की उत्पत्ति हुई है। इन्हीं चरणों का लक्ष्मी जी बड़ी श्रद्धा के साथ निरन्तर सेवन करती रहती हैं। इन्हीं चरणों का ध्यान योगीजन अपने हृदय-कमल में निरन्तर करते रहते हैं। इन्हीं चरणों को प्रभु ने गयासुर के मस्तक पर रखकर उसे सद्गति प्रदान की थी।’
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असंख्य लोगों की भीड़ थी, हजारों आदमी पाद-पद्मों के दर्शन कर रहे थे और बीच-बीच में जय-घोष करते जाते थे। पण्डा लोग उनसे भेंट चढ़ाने का आग्रह कर रहे थे। बार-बार पाद-पद्मों का पुण्य-माहात्म्य सुनाया जा रहा था।
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पाद-पद्मों का माहात्म्य सुनते ही निमाई पण्डित आत्मविस्मृत हो गये। उन्हें शरीर का होश नहीं रहा। शरीर थर-थर काँपने लगा, युगल अरुण ओष्ठ कोमल पल्लव की भाँति हिलने लगे। आँखों से निरन्तर अश्रुधारा बहने लगी। उनके चेहरे से भारी तेज निकल रहा था। वे एकटक पाद-पद्मों की ओर निहार रहे थे।
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वे कहाँ खड़े हैं, उनके पास कौन है, किसने उन्हें स्पर्श किया, इन सभी बातों का उन्हें कुछ भी पता नहीं है। वे संज्ञाशून्य-से होकर काँप रहे हैं, उनका शरीर उनके वश में नहीं है, वे मूर्च्छित होकर गिरने वाले ही थे कि सहसा एक तेजस्वी संन्यासी का सहारा लगने से वे गिरने से बच गये। उनके साथियों ने उन्हें पकड़ा और भीड़ से हटाकर जल्दी से बाहर ले गये।
बाहर पहुँचकर उन्हें कुछ होश आया और वे निद्रा से उठे मनुष्य की भाँति अपने चारों ओर आँखें उठा-उठाकर देखने लगे। सहसा उनकी दृष्टि एक लम्बे-से तेजस्वी संन्यासी पर पड़ी। वे उन्हें देखकर एक साथ चौंक उठे, उनके आनन्द का वारापार नहीं रहा। इन्होंने दौड़कर संन्यासी जी के चरण पकड़ लिये। अपनी आँखों से अश्रुविमोचन करते हुए संन्यासी ने इन्हें उठाकर गले से लगा लिया।
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इनके स्पर्शमात्र से संन्यासी महाशय बेहोश हो गये। दोनों ही आत्मविस्मृत थे। दोनों को ही शरीर का होश नहीं था, दोनों ही प्रेम में विभोर होकर अश्रुविमोचन कर रहे थे। यात्री इन दोनों के ऐसे अलौकिक प्रेम को देखकर आनन्द-सागर में गोते खाने लगे। बहुत-से लोग रास्ता चलते-चलते खड़े हो गये। चारों ओर से लोगों की भीड़ लग गयी।
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कुछ काल में संन्यासी को कुछ-कुछ चेतना हुई। उन्होंने बड़े ही प्रेम से इनका हाथ पकड़कर एक ओर बिठाया और अत्यन्त प्रेमपूर्ण वाणी से वे कहने लगे- ‘निमाई पण्डित ! आज मेरा भाग्योदय हुआ जो सहसा मुझे तुम्हारे दर्शन हो गये। नवद्वीप में ही मेरा हृदय तुम्हारी ओर स्वाभाविक ही खिंचा-सा जाता था।
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मुझसे लोग कहते- ‘निमाई पण्डित कोरे पोथी के ही पण्डित हैं, बड़े चंचल हैं, देवता तथा वैष्णवों की खिल्लियाँ उड़ाते हैं। आप उनहें अपना ‘श्रीकृष्णलीलामृत’ सुनाकर क्या लाभ उठावेंगे?’ कोई-कोई तो यहाँ तक कहता- ‘अजी, ये तो पूरे नास्तिक हैं। वैष्णवों को छेड़ने में ही इन्हें मजा आता है।’
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मैं उन सबकी बातें सुनता और चुप हो जाता। मेरा अन्तःकरण इन बातों को कभी स्वीकार ही नहीं करता था। मैं बार-बार यही सोचता था- ‘निमाई पण्डित- जैसे सरस, सरल, सहृदय और भावुक पुरुष, भक्तिहीन कभी हो नहीं सकते। इनके मुख का तेज ही इनकी भावी शक्ति का परिचय दे रहा है।
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आज आपके दर्शन के समय के भाव को देखकर मेरे आनन्द की सीमा नहीं रही। मैं कृतकृत्य हो गया। भगवत-दर्शन से जो आनन्द मिलता है, उसी आनन्द का मैं अनुभव कर रहा हूँ। मैं अपने आनन्द को प्रकट करने में असमर्थ हूँ।’ इतना कहते-कहते संन्यासी महाशय का गला भर आया। आगे वे कुछ और भी कहना चाहते थे, किन्तु कह नहीं सके।
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उनके नेत्रों में से अश्रुधारा अब भी पूर्ववत बह रही थी। संन्यासी महाराज की बातें सुनते-सुनते इन्हें कुछ चेतना हो गयी थी। इसलिये रूँधे हुए कण्ठ से कुछ अस्पष्ट स्वर में इन्होंने कहा- ‘प्रभो ! आज मैं कृतार्थ हुआ। मेरी गया-यात्रा सफल हुई। मेरी असंख्यों पीढि़यों का उद्धार हो गया, जो यहाँ आने पर आपके दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
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तीर्थ में श्राद्ध करने पर तो उन्हीं पितरों की मुक्ति होती है, जिनके निमित्त श्राद्ध-तर्पणादि कर्म किये जाते हैं, किन्तु आप-जैसे परम भागवत वैष्णवों के दर्शन से तो करोड़ों पीढ़ियों के पितर स्वतः ही मुक्त हो जाते हैं। सब लोगों को आपके दर्शन दुर्लभ हैं। जिनका भाग्योदय होता है, उन्हीं को आपके दर्शन होते हैं।’ यह कहते-कहते इन्होंने फिर से संन्यासी महाशय के चरण पकड़ लिये।
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संन्यासी जी ने हठपूर्वक अपने चरण छुड़ाये और इन्हें प्रेम वाक्यों से आश्वासन दिया। पाठक समझ ही गये होंगे ये संन्यासी महाशय कौन हैं। ये वे ही भक्ति-बीज के अंकुरित करने वाले श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी जी के सर्वप्रधान प्रिय शिष्य श्री ईश्वरपुरी हैं, जिन्हें अन्तिम समय में गुरुदेव अपना सम्पूर्ण तेज प्रदान करके इस संसार से तिरोहित हो गये थे।
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नवद्वीप के प्रथम मिलन में ही ये निमाई पण्डित के अलौकिक तेज और अद्वितीय रूप-लावण्य पर मुग्ध होकर इन्हें एकटक देखते-के-देखते ही रह गये थे। इन्हें इस प्रकार देखते देखकर निमाई पण्डित ने हँसकर कहा था- ‘आज हमारे घर ही भिक्षा कीजियेगा, तभी हमें दिनभर भलीभाँति देखते रहने का सुअवसर प्राप्त हो सकेगा।’
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उनकी प्रार्थना पर ये उनके घर भिक्षा करने गये थे और कुछ काल तक अपने स्वसम्पादित ग्रन्थ ‘श्रीकृष्णलीलामृत’ को भी उन्हें सुनाते रहे। तभी से पुरी महाशय के हृदय-पटल पर इनकी प्रेममयी मनोहर मूर्ति खिंच गयी थी। आज सहसा भेंट हो जाने पर दोनों ही आनन्द में डूब गये और आनन्द के उद्वेग में ही उपर्युक्त बातें हुई थीं।
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पुरी महाशय की आज्ञा लेकर निमाई पण्डित अपने स्थान के लिये विदा हुए। स्थान पर पहुँचकर इन्होंने साथियों को संग लेकर गया के सभी मुख्य-मुख्य तीर्थों के दर्शन किये और वहाँ जाकर यथाविधि शास्त्ररीत्यनुसार श्राद्ध और पिण्डादि पितृ-कर्म किये। अन्तः सलिता भगवती फल्गुनदी में जाकर इन्होंने पितरों के लिये बालुका के पिण्ड दिये।
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फल्गुका प्रवाह गुप्त है। उसका जल नीचे-ही-नीचे बहता है। ऊपर से बालू ढकी रहती है। बालू को हटाकर जल निकाला जाता है और यात्री उससे स्नान-सन्ध्यादि कृत्य करते हैं। प्रेत-गया, राम-गया, युधिष्ठिर-गया, भीम-गया, शिव-गया आदि सोलहों गया में निमाई पण्डित ने अपने साथियों के साथ जा-जाकर पितरों के पिण्ड और श्राद्धादि कर्म किये, सब स्थानों में दर्शन तथा श्राद्ध करके ये अपने ठहरने के स्थान पर लौट आये।
(क्रमशः)

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