शुक्रवार, 6 मार्च 2020

*३४. भक्तिस्त्रोत उमड़ने से पहले*

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू सहजैं मेला होइगा, हम तुम हरि के दास ।*
*अंतरगति तो मिलि रहे, पुनि प्रकट प्रकाश ॥*
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*३४. भक्तिस्त्रोत उमड़ने से पहले*
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वास्तव में तो भक्ति तथा मुक्ति दो वस्तु हैं ही नहीं। एक ही वस्तु को दो नामों से पुकारते हैं, अपनी भावना के ही अनुसार एक प्रिय वस्तु को दो रूपों में देखते हैं। साध्य तो एक ही है- उसे चाहे भक्ति कह लो या मुक्ति और उसका साधन भी एक ही है- अनासक्तभाव से भगवत-सेवा या कर्तव्य समझकर निष्काम कर्म।
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हाँ, करने की प्रक्रियाएँ पृथक-पृथक अवश्य हैं, जिनका रुचि-वैचित्र्य के कारण अधिकारी-भेद से पृथकृ-पृथक होना आवश्यक ही है।
✥ एक में त्याग ही प्रधान है, घर को त्यागो, संग को त्यागो, आसक्ति को त्यागो, नाम-रूप को त्यागो, फिर अपने-आपको भी त्याग दो।
✥ दूसरे में प्रेम की प्रधानता है, अच्छे पुरुषों से प्रेम करो, भगवद्भक्तों से प्रेम करो, भगवत-चरित्रों से प्रेम करो, प्रेम से प्रेम करो। फिर जाकर प्रेम में समा जाओ। ये मुक्ति-भक्ति दो मार्ग हैं।
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महाप्रभु चैतन्यदेव का जीवन तो भक्तिमार्ग का एक प्रधान स्तम्भ है। उनके जीवन में शुद्ध भक्ति का परम पवित्र स्वरूप है, उसमें पक्षपात का लेश नहीं, दूसरे मार्ग के प्रति विद्वेष नहीं। किसी भी कर्म की उपेक्षा नहीं। संकुचित भावों की गन्ध नहीं। वहाँ तो शुद्ध प्रेम है !
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ज्यों-ज्यों आगे बढ़ना चाहो त्यों-ही-त्यों अधिकाधिक प्रेम करो, यही शिक्षा उसमें ओत-प्रोतरूप से भरी पड़ी है। उनका नाम लेकर आज जो बातें कही जाती हैं, वे चैतन्यदेव की कभी हो ही नहीं सकतीं। इसका साक्षी उनका प्रेममय जीवन ही है।
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ये साम्प्रदायिक विचार तो पीछे के संकुचित बुद्धि वाले लोगों के मस्तिष्क से निकले हैं। अपनी चीज का नाम कोई जो चाहे रख ले। कोई रोकने वाला थोड़े ही है। चैतन्य का जीवन तो परम प्रेममय, सभी को आश्रय देने वाला परम महान है, उसमें भला साम्प्रदायिक संकुचित भावों का क्या काम? इनके हृदय में प्राणिमात्र के भावों का आदर था।
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निमाई पण्डित का अब दूसरा विवाह हो गया है। विष्णुप्रिया उनके सब प्रकार से अनुकूल आचरण करती हैं। उनका स्वभाव हँसमुख है, वे सुशीला हैं, गृहकार्यों में चतुर हैं और अत्यन्त ही पतिपरायणा हैं, वे अपने पति को ही सर्वस्व समझती हैं।
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यह सब होते हुए भी निमाई का चित्त अब उदास ही रहता है। पता नहीं क्यों? अब उनकी वह चपलता न जाने कहाँ चली गयी? घंटों एकान्त में न जाने क्या सोचा करते हैं? अब उन्हें संसारी बातों से अनुराग नहीं है। अब उनका हृदय किसी विशेष वस्तु के लिये छटपटाता-सा दिखायी पड़ता है। अब वे अपने में किसी एक विशेष अभाव का-सा अनुभव करने लगे हैं। इस बात से उनके सभी स्नेही चिन्तित रहते हैं।
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जब हृदय में किसी प्रबल भाव का आगमन होने को होता है, तो उसके पूर्व हृदय एक प्रकार के अभाव का अनुभव करने लगता है। जी चाहता है कहीं चलकर अपनी प्रिय वस्तु को ले आवें। ऐसी ही दशा में लोग तीर्थों में जाते हैं। तीर्थों में अच्छे-अच्छे धार्मिक लोगों के सत्संग का सुयोग प्राप्त होता है, विरक्त साधु-महात्माओं के दर्शन होते हैं। उनके सत्संग तथा सदुपदेश से हृदय में एक प्रकार की शान्ति होती है।
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इसलिये निमाई की भी इच्छा तीर्थ-भ्रमण करने की हुई। बंगाल में सकाम कर्मों की प्रधानता है, वहाँ के बहुत ही कम मनुष्य निष्काम कर्म का महत्त्व जानते हैं। अधिकांश लोग किसी-न-किसी कामना से ही सम्पूर्ण धार्मिक कार्यों को करते हैं। सकाम कर्मों में पितृश्राद्ध को बहुत महत्त्व दिया गया है। स्मृतियों में तो पितृकर्मों से भी देवकर्मों की अधिक महत्ता दी गयी है।
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गृहस्थियों के लिये पितृकर्म ही मुख्य बताये गये हैं। पितृकर्मों में गयाधाम में जाकर पितरों के श्राद्ध करने का बहुत भारी माहात्म्य वर्णन किया गया है, इसलिये प्रतिवर्ष बंगाल से लाखों मनुष्य गया जी में पितृश्राद्ध करने आते हैं। दूसरे प्रान्तों से भी बहुत बड़ी संख्या में यात्री गया जी पितृश्राद्ध करने आते हैं, किन्तु बंगाल में इसका प्रचार अन्य प्रान्तों की अपेक्षा विशेष है।
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अबकी बार अन्य लोगों के साथ निमाई पण्डित ने भी गया में जाकर अपने पिता का श्राद्ध कर आने का विचार किया। किन्तु इनके विचार में अन्य लोगों की भाँति सकाम भावना नहीं थी, ये तो अपने अभाव को दूर करने और धार्मिक लोगों के भावों का आदर करने के निमित्त ही गया जी जाना चाहते थे।
(क्रमशः)

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