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*दादू गैब मांहिं गुरुदेव मिल्या, पाया हम परसाद ।*
*मस्तक मेरे कर धर्या, दिक्ष्या अगम अगाध ॥*
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साभार ~ Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*३६. प्रेम-स्त्रोत उमड़ पड़ा*
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श्रृण्वन्सुभद्राणि रथांगपाणे-
र्जन्मानि कर्माणि च यानिलोके।
गीतानि नामानि तदर्थकानि
गायन्विलज्जो विचरेदसंगः॥[१]
([१] रथांगपाणिभगवान के ‘चक्रपारथांगपाणिभगवान के ‘चक्रपाणि’ ‘गोपिजनवल्लभ’ ‘राधारमण’ आदि सुन्दर और सुमनोहर नामों का तथा उसके अर्थों का गान और उनकी अलौकिक दिव्य-दिव्य लीलाओं का संकीर्तन करता हुआ श्रेष्ठ भक्त निर्लज्ज और निरीह होकर निःसंगभाव से पृथ्वी पर विचरण करे। श्रीमद्भा. ११/२/३९)
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संसार में उन्हीं मनुष्यों का जीवन धारण करना सार्थक कहा जा सकता है, जिनके हृदय-पटल पर हर समय मुरली मनोहर मुकुन्द की मंजुल मूर्ति नृत्य करती रहती हो। जिनके कर्ण-रन्ध्रों में प्रतिक्षण मनोहर मुरली की मधुर तान सुनायी पड़ती रहती हो।
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जिनके चक्षु भगवान की मूर्ति के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु का दर्शन ही न करना चाहते हों, जिनका मनमधुप सदा भक्त-भयहारी भगवान के चरण-कमलों का मधुरातिमधुर मकरन्द-पान करता रहता हो, ऐसे शुभ-दर्शन भक्त स्वयं तो कृतकृत्य होते ही हैं, वे सम्पूर्ण संसार को भी अपनी पद-रज से पावन बना देते हैं।
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उनकी वाणी में उन्माद होता है, दृष्टि में जीवों को अपनी ओर आकर्षित करने की शक्ति होती है, उनके सभी कार्य अलौकिक होते हैं, उनके सम्पूर्ण कार्य लोकबाह्य और संसार के कल्याण करने वाले ही होते हैं।
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निमाई पण्डित की हृदय-कन्दरा में से जो त्रैलोक्यपावन प्रेम-स्त्रोत उमड़ने वाला था, जिसका सूत्रपात चिरकाल से हो रहा था, अद्वैताचार्य आदि भक्तगण जिसकी लालसा लगाये वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे थे, उस स्त्रोत का पृथ्वी पर परिस्फुट होने का सुहावना समय अब सन्निकट आ पहुँचा।
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जगत-विख्यात गयाधाम को ही उसके प्रकट करने का अखण्ड यश प्राप्त हो सका। यही पावन पृथ्वी इसका कारण बन सकी। अहा ‘वसुन्धरा पुण्यवती च तेन’। सचमुच वह वसुन्धरा बड़भागिनी है, जिसका संसर्ग किसी महापुरुष की लोकविख्यात घटना के साथ हो सके। वही संसार में पावन तीर्थ के नाम से विख्यात हो जाता है।
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निमाई पण्डित अपने निवास स्थान पर अन्य साथियों के साथ भोजन बना रहे थे। दाल-साग बनकर तैयार हो चुके थे। चूल्हे में से थोड़ी अग्नि निकालकर दाल को उस पर रख दिया था। साग दूसरी ओर चौके में ही रखा था। चूल्हे पर भात बन रहा था। निमाई उसे बार-बार देखते। चावल तैयार तो हो चुके थे, किन्तु उनमें थोड़ा-सा जल और शेष था, उसे जलाने के लिये और भात केा शुष्क बनाने के लिये हमारे पण्डित ने उसे ढक दिया था।
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थोड़ी देर बाद वे कटोरी को भात पर से उतार ही रहे थे कि इतने में ही उन्हें दूर से पुरी महाशय अपनी ओर आते हुए दिखायी दिये। कटोरी को ज्यों-की-त्यों ही पृथ्वी पर पटककर ये उनकी चरण-वन्दना करने के लिये दौड़े। पुरी ने प्रेमपूर्वक इनका आलिंगन किया और वे हँसते हुए बोले- ‘अपने स्थान से किसी शुभ मुहूर्त में ही चले थे, जो ठीक तैयारी के समय पर आ पहुँचे।’
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नम्रता के साथ निमाई पण्डित ने उत्तर दिया- ‘जिस समय भाग्योदय होता है और पुण्य-कर्मों के संस्कार जागृत होते हैं, उस समय आप-जैसे महानुभावों के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है। भोजन बिलकुल तैयार है, हाथ-पैर धोइये ओर भिक्षा करने की कृपा कीजिये।’
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हँसते हुए पुरी महाशय बोले- ‘यह खूब कही, अपने लिये बनाये हुए अन्न को हमें ही खिला दोगे, तब तुम क्या खाओगे?’ नम्रता के साथ नीची निगाह करके इन्होंने उत्तर दिया- ‘अन्न तो आप ही का है, मैं तो केवल रन्धन करने वाला पाचकमात्र हूँ, आज्ञा होगी तो और बना दूँगा।’
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पुरी ने देखा ये भिक्षा बिना कराये मानेंगे नहीं। इसलिये बोले- ‘अच्छा, फिर से बनाने की क्या आवश्यकता है, जो बना है उसी में से आधा-आधा बाँटकर खा लेंगे। क्यों मंजूर है न? किन्तु हम ठहरे संन्यासी और तुम ठहरे गृहस्थी। हमारी भिक्षा होगी और तुम्हारा होगा भोजन। इस प्रकार कैसे काम चलेगा? तुम भी थोड़ी देर के लिये भिक्षा ही कर लेना।’
कुछ हँसते हुए निमाई पण्डित ने कहा- ‘अच्छा, जैसी आज्ञा होगी, वही होगा। आप पहले हाथ-पैर तो धोवें।’ यह कह इन्होंने अपने हाथों से पुरी जी के पैर धोये और उन्हें एक सुन्दर आसन पर बिठाया। पुरी महाशय बैठकर भोजन करने लगे। जब निमाई-जैसे प्रेमावतार परोसने वाले हों, तब भला फिर किसी तृप्ति हो सकती है, धीरे-धीरे इन्होंने आग्रह कर-करके सभी सामान पुरी महाशय को परोस दिया और वे भी प्रेम के वशीभूत होकर सारा खा गये।
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अग्नि तो जल ही रही थी, क्षणभर में ही दूसरी बार भी भोजन तैयार हो गया मानो अन्नपूर्ण ने आकर स्वयं ही भोजन तैयार कर दिया हो। भोजन तैयार होने पर इन्होंने भी भोजन किया और फिर परस्पर बातें होने लगीं।
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हाथ जोड़े हुए निमाई पण्डित ने कहा- ‘भगवन ! अब तो हमें बहुत दिन इस ब्राह्यवृत्ति के जीवन को बिताते हुए हो गये, अब हमें अपने चरणों की शरण प्रदान कीजिये। कृपा करके थोड़ी-बहुत श्रीकृष्णभक्ति हमें भी दीजिये।’
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इनकी बात का उत्तर देते हुए पुरी महाशय ने कहा- ‘आप तो स्वयं ही श्रीकृष्ण-स्वरूप हैं, आपको भला भक्ति कौन प्रदान कर सकता है? आप स्वयं ही सम्पूर्णज्ञ संसार को प्रेम-प्रदान कर सकते हैं।’ दीनता के साथ इन्होंने कहा- ‘प्रभो ! मेरी वंचना न कीजिये। मेरी प्रार्थना स्वीकृत कीजिये और मुझे श्रीकृष्ण-मन्त्र प्रदान कर दीजिये।’ पुरी ने सरलता के साथ कहा- ‘आप श्रीकृष्ण-मन्त्र प्रदान करने को ही कहते हैं, हम आपके कहने पर अपने प्राण प्रदान कर सकते हैं, किन्तु हममें इतनी योग्यता हो तब तो? हम स्वयं अधम हैं।
(क्रमशः)

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