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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२०६ - परिचय उपदेश । त्रिताल
सहज सहेलड़ी हे,
तूँ निर्मल नैन निहारि ।
रूप अरूप निर्गुण आगुण१ में,
त्रिभुवन देव मुरारि ॥टेक॥
बारम्बार निरख जगजीवन,
इहि घर हरि अविनाशी ।
सुन्दरि जाइ सेज सुख विलसे,
पूरण परम निवासी ॥१॥
सहजैं संग परस जगजीवन,
आसण अमर अकेला ।
सुन्दरि जाइ सेज सुख सोवै,
जीव ब्रह्म का मेला ॥२॥
मिलि आनन्द प्रीति करि पावन,
अगम निगम जहं राजा ।
जाइ तहां परस पावन को,
सुन्दरि सारे काजा ॥३॥
मँगलाचार चहूं दिशि रोपै,
जब सुन्दरि पिव पावै ।
परम ज्योति पूरे सौं मिल कर,
दादू रँग लभावै ॥४॥
साक्षात्कारार्थ उपदेश कर रहे हैं - हे बुद्धि वृत्ति रूप सहेली ! तू निर्द्वन्द्व होकर सँशय विपर्य्य - मल रहित ज्ञान नेत्रों से त्रिभुवन के रूपवान्, अरूप, गुण रहित, और सहगुण१ सभी पदार्थों में मुरारि देव को देख, वे अविनाशी हरि इस हृदय घर में ही हैं,
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उन जगजीवन को बारम्बार देख । हे सुन्दरि ! ऐसा करने से तू सब विश्व में निवास करने वाले परम परिपूर्ण प्रभु की स्वरूपाकार शय्या पर जाकर परम सुख का उपभोग करेगी,
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अनायास ही जगजीवन प्रभु के संग होकर उनके स्पर्श द्वारा अद्वैत और अमर आसन प्राप्त करेगी । ऐसे जब वृत्ति सुन्दरी अद्वैत, अमर शय्या पर जाकर ब्रह्मानन्द रूप निद्रा में शयन करती है, तब जीव ब्रह्म एक हो जाते हैं ।
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जहां वेद से अगम प्रभु शोभित हो रहे हैं, वहां ही पवित्र प्रीति द्वारा उनसे मिलकर आनन्द ले । वहां जाकर जो वृत्ति सुन्दरी पवित्र प्रभु का स्पर्श करती है वह अपने कार्य को पूर्ण कर लेती है । जब वृत्ति सुन्दरी पवित्र प्रभु को प्राप्त करती है, वह अपने कार्य को पूर्ण कर लेती है ।
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जब वृत्ति सुन्दरी पवित्र प्रभु को प्राप्त करती है तब अन्त:करण चतुष्टय रूप चारों ही दिशाओं में मँगलाचरण होने लगते हैं और वह साधक परम ज्योति स्वरूप पूर्ण ब्रह्म से मिलकर अन्यों के भी वही रँग लगाता है ।
(क्रमशः)

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