शुक्रवार, 6 मार्च 2020

*२. स्मरण का अंग ~ १०१/१०४*

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ १०१/१०४*
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जहां लग भीजै आतमां, नख सिख सगली६ देह ।
तहां लग सुमिरन कीजिये, जगजीवन मति७ मेह ॥१०१॥
संत जगजीवन दास जी कहते हैं कि जहाँ ईश्वर प्रेम में आत्मा सराबोर हो नख से शिख तक पूरी देह रोम रोम से भजन करे तब तक प्रयास करना है थमना नहीं है।
(६. सगली-सकल{सम्पूर्ण}) (७. मति-नहीं)
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सुमिरन सौं सांचै मतै, जे लै लागै मन ।
तौ जगजीवन जनम भरि, कदै न बिनसै तन ॥१०२॥
संत कहते हैं स्मरण ही सच्ची भक्ति, शास्वत आनन्द है ऐसी अगर मन में लगन लगी हो तो, जीवन भर तो ऐसा भजन करने वाला अमर हो जाता है।
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जगजीवन सांचै मतै, सुमिरन स्यूँ करि नेह ।
रांम रसायंन पीजिये, तो सुख पावै देह ॥१०३॥
संत कहते हैं कि सत्य यह है कि स्मरण से ही स्नेह रखे, लै लगावे व राम रस पान करते रहे तभी जीव सुखी रहता है।
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जगजीवन जो रांम सौं, भीतरि बैठा लागि ।
सुमिरन करि सांचा हुवा, सो क्यूं सोवै जागि ॥१०४॥
संत कहते हैं कि जो जन अंतर स्थित राम से अपनी लगन लगाता है और जो स्मरण से ही सत्य को प्राप्त हुआ है वह ऐसे ज्ञान रुपी जागरण से अज्ञान रुपी अंधकार में क्यों जायेगा।
(क्रमशः)

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