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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ १०५/१०८*
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निजर न चूके नांउ सौं, सुमिरन करै समाइ ।
जगजीवन जहां मन रहै, तहां हरि परसै ताहि ॥१०५॥
संत कहते हैं जो जरा भी अपनी तरफ से स्मरण में चूक नहीं करते उसी में समाये रहते हैं जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि जहाँ जिसका जैसा मन रहता है प्रभु वैसे ही उसे सम्भालते हैं। जिसका मन भजन में होता है उसे भजन में ही प्रभु मिल जाते हैं।
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सुमिरन बांधे सुरति सौं, सकल समावै सुन्नि१॥
जगजीवन बोलै नहीं, पकड़ रह्या सो मुन्नि२॥१०६॥
जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं जो स्मरण, ध्यान पर अडिग रहता है वही सफल साधक या मुनि जन है। ऐसा साधक साधना पथ पर दृढ़ता से चलते चलते शून्य में समा जाता है ।
(१. सुन्नि-शून्य{निरंजन, निराकार, परमात्मा}) (२. मुन्नि-सफल साधक)
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जगजीवन मांहै करै, सुमिरन रसनां खोलि ।
मांगै सौ पावै सकल, अनबोल्यां३ सु बोलि ॥१०७॥
संत कहते हैं कि जो अंतर में स्मरण रुपी रसना खोलकर स्मरण करते हैं उन्हें जो चाहिए होता है वह मिल जाता है। जो बोलता नहीं है ऐसे प्रभु से वे साधक सुन्दर सम्भाषण करते हैं। (३. अनबोल्यां-अयाचित)
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सुमिरन४ कीजै सुरति सों, तो सके न कोई गंजि ।
जगजीवन भगवन्त भजि, भरम करम में भंजि४॥१०८॥
संत कहते हैं कि एकाग्रता से ध्यान लगा कर जो स्मरण करता है उसे कोइ अभाव नहीं होता है। भगवन्नाम का सतत स्मरण करने से सांसारिक प्रपंच स्वतः ही नष्ट(भंज) हो जाता है।
{४-४. यदि स्मृतिपूर्वक भगवन्नाम लिया जाय तो इस शुभ कर्म की समानता बड़ी से बड़ी रत्नों की खान(गंज) या धन राशि भी नहीं कर सकती । साथ ही, भगवन्नाम का सतत स्मरण करने से सांसारिक मायाजाल स्वतः ही नष्ट(भंज) हो जाता है ॥१०८॥}
(क्रमशः)

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