शुक्रवार, 6 मार्च 2020

भागवत की कथा

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*आंगण एक कलाल के, मतवाला रस मांहि ।*
*दादू देख्या नैन भर, ताके दुविधा नांहि ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ परिचय का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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केशव को जिस समय समाचार दिया गया उस समय वे भाई अघोरनाथ के शोक में अशौच अवस्था में थे । प्रचारक भाई अघोर ने ८ दिसम्बर बृहस्पतिवार को लखनऊ शहर में देहत्याग किया था । सभी ने अनुमान किया कि केशव न आ सकेंगे । समाचार पाकर केशव बोले, “यह कैसे ! परमहंस महाशय आएँगे और मैं न जाऊँ? अवश्य जाऊँगा ! अशौच में हूँ इसलिए मैं अलग स्थान पर बैठकर खाऊँगा ॥”
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मनोमोहन की माता परम भक्तिमती श्यामसुन्दरी देवी ने श्रीरामकृष्ण को भोजन परोसा था । राम भोजन के समय पास खड़े थे । जिस दिन राजेन्द्र के घर पर श्रीरामकृष्ण ने शुभागमन किया उस दिन तीसरे पहर सुरेन्द्र ने उन्हें चीना बाजार में ले जाकर उनका फोटो उतरवाया था । श्रीरामकृष्ण खड़े खड़े समाधिमग्न थे ।
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उत्सव के दिन महेन्द्र गोस्वामी ने भागवत की कथा की ।
जनवरी १८८२ ई.-माघोत्सव के उपलक्ष्य में, शिमुलिया ब्राह्मसमाज के उत्सव में ज्ञान चौधरी के मकान पर श्रीरामकृष्ण और केशव आमन्त्रित होकर उपस्थित थे । आँगन में कीर्तन हुआ । इसी स्थान में श्रीरामकृष्ण ने पहले-पहल नरेन्द्र का गाना सुना और उन्हें दक्षिणेश्वर आने के लिए कहा ।
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२३ फरवरी १८८२ ई. बृहस्पतिवार को केशव ने दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण का फिर से दर्शन किया । उनके साथ थे अमेरिकन पादरी जोसेफ कुक तथा कुमारी पिगाट । ब्राह्मभक्तों के साथ केशव ने श्रीरामकृष्ण को स्टीमर पर बैठाया । कुक साहब ने श्रीरामकृष्ण की समाधि-स्थिति देखी थी । उस समय श्री नगेन्द्र उसी जहाज में उपस्थित थे । उनके मुख से समस्त वार्ता सुन १०-१५ दिन के अन्दर मास्टर ने दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण का प्रथम दर्शन किया ।
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तीन मास बाद-अप्रैल मास में-श्रीरामकृष्ण कमलकुटीर में केशव को देखने आए । उसी का थोड़ासा विवरण निम्नलिखित परिच्छेद में दिया गया है ।
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श्रीरामकृष्ण का केशव के प्रति स्नेह । जगन्माता के पास नारियल-शक्कर की मन्नत ~
आज कमलकुटीर के उसी बैठक-घर में श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बैठे हैं । २ अप्रैल १८८२ ई., रविवार, दिन के पाँच बजे का समय । केशव भीतर के कमरे में थे । उन्हें समाचार दिया गया । कमीज पहनकर और चद्दर ओढ़कर उन्होंने आकर प्रणाम किया । उनके भक्त मित्र कालीनाथ बसु रुग्ण हैं, वे उन्हें देखने जा रहे हैं ।
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श्रीरामकृष्ण आए हैं, इसलिए केशव नहीं जा सके । श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “तुम्हें बहुत काम रहता है, फिर अखबार में भी लिखना पड़ता है, वहाँ(दक्षिणेश्वर) जाने का अवसर नहीं रहता । इसलिए मैं ही तुम्हें देखने आ गया हूँ । तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है, यह जानकर नारियल-शक्कर की मन्नत मानी थी । माँ से कहा, “माँ, यदि केशव को कुछ हो जाय तो फिर कलकत्ता जाकर किसके साथ बात करूँगा?”
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श्री प्रताप आदि ब्राह्मभक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण वार्तालाप कर रहे हैं । पास ही मास्टर को बैठे देख वे केशव से कहते हैं, “वे वहाँ पर(दक्षिणेश्वर में) क्यों नहीं जाते हैं, पूछो तो ! इतना ये कहते हैं कि स्त्री-बच्चों पर मन नहीं हैं ।” एक मास से कुछ अधिक समय हुआ, मास्टर श्रीरामकृष्ण के पास आया जाया करते हैं । बाद में जाने में कुछ दिनों का विलम्ब हुआ । इसीलिए श्रीरामकृष्ण इस प्रकार कह रहे हैं । उन्होंने कह दिया था, ‘आने में देरी होने पर मुझे पत्र देना ।’
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ब्राह्मभक्तगण श्री सामाध्यायी को दिखाकर श्रीरामकृष्ण से कह रहे हैं, “आप विद्वान हैं । वेद शास्त्रादि का आपने अच्छा अध्ययन किया है ।” श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “हाँ, इनकी आँखों में से इनका भीतरी भाग दिखायी दे रहा है । ठीक जैसे खिड़की की काँच में से घर के भीतर की चीजें दिखायी देती है ।”
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श्री त्रैलोक्य गाना गा रहे हैं । गाना हो रहा है । इतने में ही सन्ध्या का दिया जलाया गया । गाना सुनते सुनते श्रीरामकृष्ण एकाएक खड़े हो गये, और माँ, का नाम लेते लेते समाधिमग्न हो गए । कुछ स्वस्थ होकर स्वयं ही नृत्य करते करते गाना गाने लगे जिसका आशय इस प्रकार है :-
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“मैं सुरापान नहीं करता, ‘जय काली’ कहता हुआ सुधा का पान करता हूँ । वह सुधा मुझे इतना मतवाला बना देती है कि लोग मुझे नशाखोर कहते हैं । गुरुजी का दिया हुआ गुड़ लेकर प्रवृत्ति का मसाला मिलाकर ज्ञानरुपी कलार उससे शराब बनाता है और मेरा मतवाला मन उसे मूलमन्त्ररूपी बोतल में से पीता है । पीने के पहले ‘तारा’ कहकर मैं उसे शुद्ध कर लेता हूँ । रामप्रसाद’ कहता है कि ऐसी शराब पीने पर धर्म-अर्थादि चतुवर्ग की प्राप्ति होती है ।”
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श्री केशव को श्रीरामकृष्ण स्नेहपूर्ण नेत्रों से देख रहे हैं, मानो अपने निजी हैं । और मानो भयभीत हो रहे हैं कि कहीं केशव किसी दूसरे के अर्थात् संसार के न बन जाएँ । उनकी ओर ताकते हुए श्रीरामकृष्ण ने फिर गाना प्रारम्भ किया, जिसका भावार्थ इस प्रकार का है-
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“बात करने से भी डरती हूँ, न करने से भी डरती हूँ । हे राधे, मन में सन्देह होता है कि कहीं तुम जैसी निधि को गवाँ न बैठूँ । हम तुम्हें वह मन्त्र बतलाती हैं जिससे हम विपत्ति से पार हो गयी हैं और जो लोगों को भी विपत्ति से पार कर देता हैं । अब तुम्हारी जैसी इच्छा ।” अर्थात् सब कुछ छोड़ भगवान् को पुकारो, वे ही सत्य हैं और सब अनित्य है । उन्हें प्राप्त किए बिना कुछ भी न होगा-यही महामन्त्र है ।
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फिर बैठकर भक्तों के साथ वार्तालाप कर रहे हैं । उनके लिए जलपान की तैयारी हो रही है । हाल के एक कोने में एक ब्राह्मभक्त पियानो बजा रहे हैं । श्रीरामकृष्ण प्रसन्नवदन हो बालक की तरह पियानो के पास खड़े होकर देख रहे हैं । थोड़ी देर बाद उन्हें अन्तःपुर में ले जाया गया, -वहाँ वे जलपान करेंगे और महिलाएँ उन्हें प्रणाम करेंगी ।
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श्रीरामकृष्ण का जलपान करेंगे और महिलाएँ उन्हें प्रणाम करेंगी । श्रीरामकृष्ण का जलपान समाप्त हुआ । अबवे गाड़ी में बैठे । ब्राह्मभक्तगण सभी गाड़ी के पास खड़े हैं । कमलकुटीर से गाड़ी दक्षिणेश्वर की ओर चली ।
(क्रमशः)

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