गुरुवार, 5 मार्च 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२०५ - झपताल
निकट निरंजन देखि हौं, छिन दूर न जाई ।
बाहर भीतर एक सा, सब रह्या समाई ॥टेक॥
सतगुरु भेद लखाइया, तब पूरा पाया ।
नैनन हीं निरखूँ सदा, घर सहजैं आया ॥१॥
पूरे सौं परचा भया, पूरी मति जागी ।
जीव जाँन जीवन मिल्या, ऐसे बड़ भागी ॥२॥
रोम रोम में रम रह्या, सो जीवन मेरा ।
जीव पीव न्यारा नहीं, सब संग बसेरा ॥३॥
सुन्दर सो सहजैं रहे, घट अन्तरजामी ।
दादू सोई देखि हौं, सारों संग स्वामी ॥४॥
मैं अति निकट हृदय में ही निरंजन राम को देख रहा हूं, वे एक क्षण भी हृदय से दूर नहीं जाते, वे तो ब्रह्माण्ड के बाहर भीतर समान रूप से व्यापक हैं । इसीलिये सब में समा रहे हैं वो सब उनमें समा रहे हैं । 
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सद्गुरु ने यह रहस्य बताया है तब ही हमने पूर्ण ब्रह्म को प्राप्त किया है । अब तो वे अनायास ही हमारे हृदय - घर में आ गये हैं, मैं उनको अपने ज्ञान नेत्रों से सदा देखता हूं । 
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पूरे गुरु से परिचय हुआ तब परमार्थ सम्बन्धी पूरी बुद्धि उत्पन्न हुई है और जीव अपने जीवन रूप प्रभु को जानकर उससे मिला है । इस प्रकार बड़भागी बना है । 
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अब तो वह मेरा जीवन - प्रभु रोम २ में रमा हुआ भासता है, जीव से परमात्मा भिन्न नहीं है, 
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वह अति सुन्दर अन्तर्यामी शरीर में रहकर अनायास ही सब के संग बसता है । जो सब के संग रहने वाला स्वामी है, उसी को मैं देखता हूं ।
(क्रमशः)

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