गुरुवार, 5 मार्च 2020

*शक्ति शिव शोध का अंग १०८*(१३/१६)* =

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*दादू गुण निर्गुण मन मिल रह्या, क्यों बेगर ह्वै जाहि ।*
*जहँ मन नांही सो नहीं, जहँ मन चेतन सो आहि ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
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*शक्ति शिव शोध का अंग १०८*
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पिंड प्राण में माया सानी, ज्यों आटे में लौण । 
सुमिरण सितिया१ स्वाद ढांकिये, मिली सु काढै कौण ॥१३॥
शरीर में और प्राणी में माया ऐसे मिली है, जैसे आटे में लौण मिला होता है, आटे के लौण को निकाल तो कौन सकता है किन्तु उसमें मिश्री डालकर लौण का स्वाद दबाया जा सकता है, वैसे ही माया को शरीर तथा प्राणी से निकाल तो कौन सकता है ? किन्तु हरि-स्मरण करके उसका भाव दबा देना चाहिये । 
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रज्जब बाल विभुति के, मूल सु तन मन माँहिं । 
कोटि बार काट्यों अकट, जड़ निकसे सो नाँहिं ॥१४॥
केशों की जड़ शरीर में होती है, उनको कोटि बार काटने पर वे बिना कटे ही रहते हैं, उनकी जड़ नहीं निकलती, वैसे ही माया जड़ मन में रहती है, अनेक बार माया खण्डन करने पर भी मन से नहीं निकलती । 
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शून्य१ स्वरूपी सांइयाँ२, बादल मय सु विभूति३ । 
रज्जब प्रकटै गुप्त ह्वै, सदा रहे इहिं४ सूति५ ॥१५॥
परमात्मा१ आकाश२ के समान हैं और माया३ बादल के समान है जैसे बादल आकाश में प्रकट - गुप्त होता रहता है इसी४ प्रकार५ माया परमात्मा में सदा रहती है । 
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सलिल सूर में सगुण सु निर्गुण, पुन: पेख तों पाणी । 
जीव ब्रह्म में ऐसे दीसै, प्रकट गुप्त गति जाणी ॥१६॥
जल सूर्य में सगुण से निर्गुण हो जाता है और पुन: वर्षते समय पानी हो जाता है, वैसे ही जीव ब्रह्म में दीखता है, जीव के प्रकट होने की चेष्टा हमने जान ली है । 
(क्रमशः)

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